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खिड़कियों से झांकता चाँद

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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कभी चाँद खिड़की से झाँककर चुप जगाता,
चाँद रोज मेरी खिड़की से मुस्काता।

कभी किसी दिन पूछ न बैठे दिल की बात,
छत पर आकर ख़त लिखता है हर रात।

यह भावपूर्ण सुकून यादों का,
रूमानी माहौल सजाता है हर बार।

यह चाँदनी रात एकांत में जब आती है,
बीती यादों को फिर से पास बुलाती है।

खिड़की से मुस्काता हुआ चाँद,
आज तेरे चेहरे सा लगता है।

तेरे चेहरे में कोई जादू है ऐसा,
जो मेरा चेहरा भी खिला देता है।

चाँद जब मेरे करीब आता है,
दिल मेरा समुंदर-सा मचल जाता है।

जब भी सोचता हूँ तेरे बारे में,
मेरा दिल हर बार संभल नहीं पाता है।

आ जाऊँ पास, मुझे अब न तड़पाओ,
लग जाऊँ गले, अब न शरमाओ।

कब तक रहूँ तुमसे दूर भला,
अब पास आ जाओ, मुझे यूँ न सताओ।

तेरे प्यार को मैंने सँभाल रखा है,
अपने दिल में छिपाकर रखा है।

चाँद चाहे हर रात खिड़की से झाँके,
तेरी याद को मैंने दिल में बसा रखा है॥