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चुप रहना स्वीकार नहीं किया

बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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था वो अमर बलिदानी (वीर भगत सिंह जयंती विशेष)…

जिसकी उम्र अभी
किताबों के पन्नों पर
सपने लिखने की थी,
लेकिन उसने
अपने समय की गुलामी को
अपनी आँखों में उतरते देखा,
और फिर
चुप रहना स्वीकार नहीं किया।

वह भगतसिंह था,
उसके हाथों में
खिलौने नहीं,
एक ऐसे भविष्य का सपना था
जहाँ मनुष्य,
मनुष्य से भयभीत न हो।

उसने क्रांति को
सिर्फ बंदूक की आवाज नहीं माना,
उसके लिए क्रांति
विचारों की वह रोशनी थी,
जो अंधेरे समय में
सोई हुई चेतना को जगाती है।

वह जानता था,
कि आज़ादी केवल
विदेशी शासन से मुक्ति नहीं,
बल्कि उस हर सोच से मुक्ति है
जो इंसान को,
इंसान से छोटा समझती है।

उसने फाँसी के फंदे को
मृत्यु की तरह नहीं देखा,
बल्कि अपने विश्वास की
अंतिम परीक्षा की तरह स्वीकार किया।

उसकी आँखों में
मृत्यु का भय नहीं,
एक अधूरे भारत की चिंता थी।

वह चाहता था,
कि खेतों में अन्न उगे
तो किसान के घर भी उजाला पहुँचे,
मजदूर की हथेली पर
मेहनत का सम्मान हो,
युवा की आँखों में
सिर्फ नौकरी का सपना नहीं,
देश और समाज को बदलने का
साहस भी हो।

उसने अपने जीवन से,
यह प्रश्न छोड़ा
क्या आज़ादी केवल
एक तारीख का उत्सव है,
या हर उस व्यक्ति की गरिमा
जिसे समाज ने
हाशिए पर खड़ा कर दिया है ?

तेईस वर्ष की उम्र में
जिसने मृत्यु को स्वीकार किया,
वह इतिहास में
केवल एक शहीद बनकर नहीं रहा।

वह प्रश्न बनकर रहा,
वह विचार बनकर रहा
वह बेचैनी बनकर रहा,
जो अन्याय देखकर
मनुष्य को चैन से बैठने नहीं देती।

उसका शरीर मिट्टी में मिला,
पर उसके विचार
पीढ़ियों की चेतना में
चलते रहे।

आज जब,
हम स्वतंत्र आकाश के नीचे
साँस लेते हैं,
तो कहीं भीतर
उस युवा की आवाज़ सुनाई देती है,
जिसने अपना आज
हमारे कल के लिए दे दिया।

था वो अमर बलिदानी,
जिसने जीवन छोटा पाया
लेकिन सपना बहुत बड़ा देखा।

वह चला गया,
पर उसकी उम्र
वहीं ठहर गई
तेईस वर्ष की उम्र में,
एक ऐसा सवाल बनकर
जिसका उत्तर
हर पीढ़ी को
अपने कर्मों से देना है।

वह भगतसिंह था,
एक नाम नहीं।
जागती हुई चेतना का,
एक अमर अध्याय॥