बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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घर का उजाला… बेटियाँ (राष्ट्रीय पुत्री दिवस विशेष)…
घर के आँगन में,
जब बेटी की हँसी उतरती है
तो लगता है,
जैसे सुबह
बिना दस्तक दिए
दरवाजे पर आ खड़ी हुई हो।
बेटियाँ,
सिर्फ घर में रहने वाली बेटियाँ नहीं होतीं
वे घर की दीवारों के बीच,
धड़कता हुआ विश्वास होती हैं।
उनके छोटे-छोटे कदमों से,
घर का सन्नाटा टूटता है
उनकी आवाज़ से,
रसोई में पकती रोटी भी
किसी उत्सव जैसी लगने लगती है।
वह माँ की आँखों में,
छिपी थकान पढ़ लेती है
पिता के माथे की,
चिंता पहचान लेती है
और बिना पूछे,
अपने हिस्से की खुशियाँ
घर में बाँट देती है।
बेटी जब पहली बार,
अपनी उँगली पकड़कर चलती है
तो घर को लगता है,
कि उसने केवल
एक बच्ची को चलना नहीं सिखाया,
बल्कि अपने भविष्य को
आगे बढ़ते देखा है।
वह बड़ी होती है,
तो घर की जिम्मेदारियाँ
उसके कंधों पर धीरे-धीरे,
उतरने लगती हैं।
कभी वह,
माँ की सहेली बनती है
कभी पिता की चिंता,
कभी भाई की ताकत
और कभी
पूरे घर की चुप्पियों को,
शब्द दे देती है।
फिर एक दिन,
वही बेटी
अपने सपनों की गठरी लेकर,
दूसरे घर चली जाती है।
पीछे रह जाता है,
उसका कमरा
उसकी किताबें,
उसकी हँसी की स्मृति,
और आँगन में
एक ऐसा सन्नाटा-
जिसे कोई आवाज़
पूरी तरह भर नहीं पाती।
लेकिन बेटी,
घर से कहाँ जाती है ?
वह माँ की दुआ में रहती है,
पिता की चिंता में रहती है
भाई की हर सफलता में,
अपनी खुशी ढूँढती है,
और मायके की चौखट से दूर होकर भी
उस घर के हर कोने में,
अपनी उपस्थिति छोड़ जाती है।
बेटियाँ,
घर का उजाला इसलिए नहीं हैं
कि वे घर को सजाती हैं,
वे उजाला इसलिए हैं
क्योंकि वे घर को,
मनुष्यता सिखाती हैं।
वे बताती हैं-
कि प्रेम केवल कहा नहीं जाता,
निभाया भी जाता है
कि रिश्ते,
सिर्फ खून से नहीं
विश्वास से भी बनते हैं।
कि किसी घर की समृद्धि,
उसकी ऊँची दीवारों में नहीं
उस घर की बेटियों की,
आँखों में सुरक्षित सपनों में होती है।
इसलिए,
बेटी के हाथ में
सिर्फ विदाई का सामान मत देना,
उसके हाथ में,
उसके सपनों की चाबी भी देना।
उसे उड़ने देना,
उसे पढ़ने देना
उसे अपने निर्णय लेने देना,
क्योंकि जिस घर ने
अपनी बेटी को,
आकाश दिया है
उस घर का उजाला,
कभी कम नहीं होता।
बेटियाँ,
दीये की लौ नहीं
जिन्हें किसी एक चौखट पर,
जलना हो
वे तो,
सूरज की तरह हैं।
जहाँ जाती हैं,
अपने साथ
एक नया सवेरा ले जाती हैं॥