इंदौर (मप्र)।
मीरा के भजन हमें संगीत और प्रार्थना के माध्यम से ईश्वर के प्रति प्रेम व्यक्त करने की शक्ति का स्मरण कराते हैं। मीरा बाई के साहित्य में स्त्री-स्वर जैसे विषय पर इंदौर लेखिका संघ जैसी स्थापित संस्था का यह अनूठा आयोजन हमें बताता है कि मीरा का काव्य केवल व्यक्तिगत पीड़ा का गान नहीं है, बल्कि वह तत्कालीन सामंती और पुरुष-सत्तात्मक व्यवस्था के विरुद्ध एक शांत, परंतु दृढ़ विद्रोह भी है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि शोभा दुबे ने यह बात कही। अवसर रहा ‘इंदौर लेखिका संघ’ द्वारा ‘मेरे तो गिरधर गोपाल – मीरा बाई के काव्य में ‘भक्ति, चेतना और स्त्री-स्वर’ विषय पर अभिनव आयोजन का। वरिष्ठ लेखिका श्रीमती दुबे के साथ संघ की संस्थापक अध्यक्ष व सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. स्वाति तिवारी की अध्यक्षता में अभिनव कला समाज के सभागार में हुए इस आयोजन में संघ की सदस्यों ने उत्साह से भाग लिया।
सुप्रसिद्ध लेखिका श्रीमती वंदिता श्रीवास्तव सारस्वत अतिथि एवं कलाकार श्रीमती अंजू घिया विशेष अतिथि रहीं।
डॉ. तिवारी ने कहा कि मीरा का जीवन सिखाता है कि कभी-कभी अपने सत्य के लिए अकेले खड़ा होना पड़ता है। उन्होंने रूढ़ियों और अपेक्षाओं के बीच अपना भक्ति-पथ चुना, लेकिन उनकी स्वतंत्रता घृणा या विद्रोह से नहीं, प्रेम की अग्नि से निकली। उन्होंने किसी को नीचा नहीं दिखाया; उन्होंने बस अपने भीतर की पुकार सुनी। मीरा का स्वर सदियों से उन सभी स्त्रियों को साहस देता आ रहा है, जो अपनी पहचान और अपनी आवाज़ के लिए संघर्षरत हैं।
वंदिता श्रीवास्तव ने कहा कि मीराबाई मध्यकालीन भक्ति आंदोलन की एक ऐसी अनूठी कवयित्री हैं, जिनके काव्य में ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम, सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ चेतना और मध्यकालीन भारतीय समाज में स्त्री-मुक्ति की सशक्त अभिव्यक्ति एक साथ दिखाई देती है। आज मीरा को केवल मंजीरा लिए कृष्ण-भक्ति में डूबी स्त्री के रूप में नहीं, बल्कि चेतना के रूप में याद करना चाहिए। उन्होंने मीरा बाई पर स्वरचित गीत सस्वर गाया।
अंजू घिया ने कहा कि मीरा की भक्ति केवल स्त्रियों की कथा नहीं, बल्कि हर मनुष्य की आत्मिक यात्रा है।
कार्यक्रम का वैचारिक सत्र ‘मीरा का काव्य:मध्यकालीन पितृसत्ता को चुनौती और स्त्री-चेतना’ विषय पर केंद्रित रहा। इस सत्र का बीज वक्तव्य देते हुए डॉ. अनिता नाइक ने कहा कि मीरा का काव्य केवल भक्ति और विरह नहीं, बल्कि स्त्री के स्वाभिमान, स्वतंत्र चेतना और अपने निर्णय स्वयं लेने के साहस की सशक्त अभिव्यक्ति है;यही उनकी स्त्री-चेतना को आज भी प्रासंगिक बनाता है। डॉ. रश्मि जोशी ने माँ मीरा को योगदर्शन का साक्षात् स्वरूप बताते हुए कहा कि मीरा का जीवन प्रेम से भक्ति, भक्ति से समर्पण और समर्पण से परमयोग तक की योगमय यात्रा है। डॉ. प्रतीक्षा शर्मा ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मीरा बाई का काव्य केवल अनन्य कृष्ण-भक्ति का मार्ग ही नहीं दर्शाता, बल्कि वह मध्यकालीन बंदिशों एवं पितृसत्तात्मक ढाँचे के विरुद्ध स्त्री-स्वाभिमान और चेतना का सशक्त स्वर भी है।
काव्य-गीत संध्या के दौरान संघ की रचनाकारों ने मीरा बाई के भक्ति, भाव और चेतना से ओत-प्रोत पदों एवं मीरां से प्रेरित स्वरचित कविताओं का प्रभावी पाठ किया। इसमें डॉ. ज्योति सिंह, डॉ. सुरेखा भारती, शीला बड़ोदिया तथा मनोरमा जोशी आदि शामिल रहे।
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण मीरा बाई के जीवन एवं पदों पर आधारित भावपूर्ण नृत्य-नाटिका और मंचन रहा। विशेष रूप से कृष्ण और प्रकृति पर एकल प्रस्तुति दी गई। विधिवत उद्घाटन डॉ. सुरेखा भारती द्वारा प्रस्तुत मंगलाचरण तथा मुख्य अतिथियों व अध्यक्ष द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ।
सफल संचालन डॉ. भारती ने किया। आभार संस्था की महासचिव शीला बड़ोदिया ने व्यक्त किया।