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लाठियॉं… देना होगा जवाब

संजय एम. वासनिक
मुम्बई (महाराष्ट्र)
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बियाबानों से तोड़कर,
लाई जाती है शहरों में 
धूप में तापकर आग में सेंक कर,
उनकी बर्बरता को
मजबूत करने के लिए,
कभी-कभी ठोकी जाती है 
नुकीली कीलें भी और,
तैयार की जाती है 
लाठियाँ…
मासूमों पर बरसाने के लिए,
जो अपने हक की लड़ाई 
लड़ते हैं, न्याय की मांग करते हैं…।

इनकी लाठियाँ…
क्यों नहीं बरसती उन 
चोर, उचक्कों और डकैतों पर,
दिनदहाड़े लूट लेते हैं 
आम जनता की आस्थाओं को,
खासकर मंदिर की दान-पेटी के चोरों पर…। 

इनकी लाठियाँ…
क्यों नहीं बरसती उन पर-
जो ना उम्र देखें, ना रिश्ता 
बस करते जाएँ अपनी हैवानियत भरी
हवस का शिकार मासूमों को,
ऐसे बलात्कारियों पर…। 

इनकी लाठियाँ…
क्यों नहीं बरसती उन पर-
जो ग़रीबों का मार कर 
खुद का मतलब देखकर,
जो चाट रहे हैं देश की संपत्ति 
दीमक बनकर 
ऐसे भ्रष्टाचारियों पर…।

इनकी लाठियाँ…
क्यों नहीं बरसती उन पर-
जो किसानों का अनाज,
ख़रीदते हैं कौड़ियों के मोल 
जमा रखते हैं अपने
आधुनिक गोदामों में,
बेचते हैं दुगने भाव से  
ऐसे जमाख़ोरों पर…।

इनकी लाठियाँ…
क्यों नहीं बरसती उन पर-
जो सत्ता के लालच में,
दलबदलू नेताओं को 
एमएलए-एमपी की
ख़रीद फ़रोख़्त का बाज़ार
बसाने वाले दल्लों पर…। 

इनकी लाठियाँ…
क्यों नहीं बरसती उन पर-
जो निहत्थे बेकसूर 
सीधे-सादे इंसान पर,
टूट पड़ते हैं
दरिंदों की भीड़ बनकर,
जाति के नाम और छुआ-छूत 
ऊँच-नीच का 
भेदभाव करने वालों पर…।

तब…
क्या इनका ज़मीर 
मर जाता है या ?
गुलामी की आदत
इन्हें जकड़ लेती है, 
कसकर…।

अब यह नहीं चलेगा,
बरसती लाठियों 
को जबाब देना होगा 
मासूमों को इंसाफ़ 
दिलाना होगा,
नहीं तो…
एक दिन क़यामत होगी,
ज़लज़ला होगा 
और यह देश।
देश नहीं; विध्वंस,
का उदाहरण होगा…॥