पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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भारत एक ऐसी भूमि है, जहाँ आस्था केवल मंदिर की घंटियों या अज़ान की आवाज़ तक सीमित नहीं रही। वह अब स्मार्टफोन की स्क्रीन पर भी उतर आई है — कभी पूजा-पाठ के वीडियो के रूप में, कभी धार्मिक संदेशों की झड़ी के रूप में, और कभी ऐसे दावों के रूप में जो तथ्य की कसौटी पर खरे नहीं उतरते, लेकिन भावनाओं की कसौटी पर करोड़ों लोगों के दिलों तक पहुँच जाते हैं। सोशल मीडिया का यह युग मनुष्य के इतिहास की सबसे बड़ी संचार क्रांति है, इसमें कोई संदेह नहीं, किंतु यही क्रांति उस विष-बेल को भी सींचती है, जिसे धार्मिक मिथक कहते हैं — वे झूठी कहानियाँ, अर्ध-सत्य और संदर्भ-विहीन सूचनाएँ जो धर्म की भाषा में परोसी जाती हैं और समाज के ताने-बाने को भीतर-ही-भीतर खोखला करती जाती हैं। उद्देश्य किसी धर्म की आलोचना नहीं है, न ही किसी आस्था को कटघरे में खड़ा करना है। यहाँ जिस प्रश्न से साक्षात्कार होना है, वह यह है कि जब धर्म और प्रौद्योगिकी का मिलन होता है, तब क्या-क्या घटित होता है — और उसके परिणाम समाज के लिए क्या-क्या होते हैं।
कोई भी विश्लेषण तब तक अधूरा है जब तक उसकी नींव ठोस तथ्यों पर न टिकी हो। जनवरी २०२४ तक भारत में फेसबुक के उपयोगकर्ताओं की संख्या लगभग ३६.६९ करोड़ थी और यू-ट्यूब के लगभग ४६.२ करोड़ थे। इसी अवधि में भारत की कुल इंटरनेट उपयोगकर्ता आबादी के ६१.५ प्रतिशत लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय थे। ये संख्याएँ केवल आँकड़े नहीं हैं — ये उस विशाल जनसमुद्र का अनुमान देती हैं जहाँ एक झूठा संदेश पलक झपकते ही लाखों लोगों तक पहुँच सकता है। वाशिंगटन स्थित शोध संस्था इंडिया हेट लैब की २०२५ में जारी रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष २०२४ में भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए नफ़रती भाषणों की ११६५ दर्ज घटनाएँ सामने आईं — जो वर्ष २०२३ में दर्ज ६६८ घटनाओं की तुलना में ७४.४ प्रतिशत की वृद्धि है। इनमें से ९९५ घटनाएं — अर्थात् लगभग ८५ प्रतिशत — पहले सोशल मीडिया पर ही पोस्ट की गईं या लाइव स्ट्रीम हुईं। फेसबुक पर ४९५, यूट्यूब पर २११ और ट्विटर (अब एक्स) पर दर्जनों ऐसी घटनाएँ दर्ज हुईं। इन सबके बावजूद फेसबुक ने ६ फरवरी २०२५ तक केवल ३ वीडियो हटाए — शेष 98.4 प्रतिशत सामग्री तब भी ऑनलाइन मौजूद थी। ये संख्याएँ किसी एक राजनीतिक विचारधारा की आलोचना नहीं हैं। ये उस संरचनागत विफलता का दस्तावेज़ हैं, जिसमें प्लेटफार्म कंपनियाँ, नीति-निर्माता और समाज एकसाथ शामिल हैं।
मनोविज्ञान का एक बुनियादी सिद्धांत है जिसे ‘कन्फर्मेशन बायस’ कहते हैं। अर्थात् मनुष्य उन सूचनाओं पर अधिक विश्वास करता है, जो उसकी पहले से बनी हुई धारणाओं को पुष्ट करती हों। धर्म के संदर्भ में यह प्रवृत्ति और भी तीव्र हो जाती है, क्योंकि धार्मिक पहचान किसी भी व्यक्ति के अस्तित्व बोध का सबसे गहरा हिस्सा होती है। जब कोई संदेश यह दावा करता है कि “हमारे देवता का अपमान हो रहा है” या “हमारे धर्म को नष्ट करने की साजिश है”, तब उस संदेश की सत्यता जाँचने की बजाय उसे तत्काल साझा करना एक प्रकार की आस्था का प्रदर्शन बन जाता है। यहाँ झूठ और सच का प्रश्न गौण हो जाता है — महत्त्वपूर्ण यह हो जाता है कि हम अपने समुदाय के साथ हैं। सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म इस मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति को और अधिक बढ़ावा देते हैं। फेसबुक, यू-ट्यूब और एक्स जैसे प्लेटफार्म उन सामग्रियों को अधिक दिखाते हैं जो अधिक जुड़ाव (एंगेजमेंट) पैदा करती हैं — और सबसे अधिक जुड़ाव वही सामग्री पैदा करती है जो क्रोध, भय या आश्चर्य जगाए। धार्मिक मिथकों में ये तीनों तत्त्व भरपूर होते हैं। परिणामतः १ झूठी, लेकिन भड़काऊ पोस्ट एक तथ्यपरक किंतु नीरस पोस्ट से कहीं अधिक तेज़ी से फैलती है। इसके अतिरिक्त व्हाट्सएप जैसे एन्ड-टू-एन्ड एन्क्रिप्टेड प्लेटफार्म पर सामग्री की कोई स्वतंत्र निगरानी संभव नहीं है। एक बंद समूह में भेजा गया संदेश — चाहे वह कितना भी असत्य क्यों न हो — बिना किसी तथ्य-जाँच के लाखों लोगों तक प्रेषित (फॉरवर्ड) होता रहता है। स्रोत का कोई उल्लेख नहीं होता, संदर्भ का कोई स्पष्टीकरण नहीं होता — बस एक दावा होता है, एक भावुक अपील होती है और कभी-कभी एक जालसाज़ी की गई तस्वीर या वीडियो होता है।
सोशल मीडिया पर फैले धार्मिक और सामाजिक मिथकों के सबसे भयावह परिणाम उन घटनाओं में देखने को मिले जिन्हें ‘व्हाट्सएप लिंचिंग’ के नाम से जाना जाता है। भारत में मई २०१७ से आरंभ हुई इस श्रृंखला ने देश को गहरे आघात दिए। सर्वाधिक चर्चित घटना अप्रैल २०२० में महाराष्ट्र के पालघर जिले के गढ़चिंचले गाँव में हुई। व्हाट्सएप पर यह संदेश तेज़ी से प्रसारित हुआ कि चोरों और बच्चा-चुराने वाले गिरोहों ने इलाके में पैर पसार लिए हैं। स्थानीय अखबारों और पुलिस रिकॉर्ड में ऐसी किसी घटना का कोई प्रमाण नहीं था — लेकिन भय और अफवाह का संयोग भयानक साबित हुआ। १६ अप्रैल २०२० की रात को जूना अखाड़े के संत चिखने महाराज कल्पवृक्षगिरि और सुशीलगिरि महाराज — तथा उनके चालक नीलेश तेलगाने नासिक से सूरत जा रहे थे। गाँव के पास पहुँचने पर लोगों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया और बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला। बाद में महाराष्ट्र के गृहमंत्री ने स्पष्ट किया कि १०१ गिरफ़्तार लोगों में से कोई भी मुसलमान नहीं था और हमलावर और पीड़ित एक ही धर्म के थे — फिर भी सोशल मीडिया पर इस घटना को सांप्रदायिक रंग देने की भरपूर कोशिश हुई। न्यूज़लॉन्ड्री और बूमलाइव जैसी फैक्ट-चेकिंग संस्थाओं ने इस सांप्रदायिक दुष्प्रचार का पर्दाफाश किया।
इसी प्रकार का एक अन्य प्रकरण २०१७ में असम के कार्बी आंगलोंग में हुआ, जब २ युवक झरने के पास सजावटी मछली ढूँढने गए और स्थानीय ग्रामीणों ने उन्हें बच्चा-चोर समझकर मार डाला। इन सभी मामलों में एक समान तत्व है — एक झूठी सूचना, एक भयभीत समुदाय और एक ऐसा माध्यम जो बिना किसी जाँच के उस झूठ को आग की गति से फैलाता है।
एक और प्रकरण इस समस्या की गहराई को और भी स्पष्ट करता है। सितंबर २०२४ में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने दावा किया कि पूर्व सरकार के कार्यकाल में तिरुपति मंदिर के प्रसाद ‘लड्डू’ में जानवरों की चर्बी और मछली के तेल का इस्तेमाल हुआ था। यह दावा किया जाने के साथ ही — किसी भी आधिकारिक पुष्टि से पहले सोशल मीडिया पर झूठी और भड़काऊ पोस्टों की बाढ़ आ गई। बूमलाइव के तथ्य-परीक्षण में पाया गया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आँकड़ों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया था। तिरुपति बालाजी शायद हिंदुओं की सबसे संवेदनशील आस्था का केंद्र है — और उसी केंद्र को लेकर राजनीतिक बयानों और सोशल मीडिया प्रचार के बीच जो अंतर था, वह करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं को झकझोरने के लिए पर्याप्त था। यह प्रकरण एक महत्त्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है: जब धार्मिक मिथकों को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाए, तो उनकी सबसे बड़ी हानि किसे होती है ? उत्तर वह नहीं है जो अपेक्षित है — सबसे बड़ी हानि उन करोड़ों श्रद्धालुओं को होती है जो अपनी आस्था की पवित्रता को असली मानते हैं और जो इन राजनीतिक खेलों के कारण अनजाने में ध्रुवीकरण का शिकार हो जाते हैं।
सोशल मीडिया पर फैलने वाले धार्मिक मिथकों को कुछ प्रमुख वर्गों में समझा जा सकता है। पहली श्रेणी है — ऐतिहासिक पुनर्लेखन के मिथक। इनमें यह दावा किया जाता है कि फलाँ स्थान पर कोई पुराना मंदिर था जिसे किसी आक्रांता ने तोड़ा, या फलाँ ऐतिहासिक व्यक्ति वास्तव में किसी धर्म का अनुयायी था। इन दावों में कभी-कभी अर्ध-सत्य का मिश्रण होता है जो उन्हें और अधिक विश्वसनीय बनाता है। दूसरी श्रेणी है — षड्यंत्र के मिथक। इनमें यह बताया जाता है कि एक विशेष धर्म या समुदाय किसी दूसरे की जनसंख्या को समाप्त करने या उनके धर्म को नष्ट करने की सुनियोजित योजना पर काम कर रहा है। ‘लव जिहाद’ इसी श्रेणी के उत्पाद हैं — जहाँ व्यक्तिगत प्रेम संबंधों को एक व्यापक सांप्रदायिक षड्यंत्र के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। तीसरी श्रेणी है — अपवित्रीकरण के मिथक। इनमें यह दावा होता है कि किसी धर्म के पवित्र स्थान, ग्रंथ, या खाद्य सामग्री को दूषित किया गया। ये मिथक सबसे तेज़ी से फैलते हैं, क्योंकि ये आस्था के सबसे कोमल धागों को छूते हैं। चौथी श्रेणी है — चमत्कार और दैवीय संकेत के मिथक। इनमें किसी मूर्ति से दूध टपकने, किसी मंदिर में अचानक रोशनी जलने, या किसी धार्मिक स्थान पर असाधारण घटना होने के दावे होते हैं। ये मिथक प्रायः सांप्रदायिक तनाव से नहीं जुड़े होते और इनका समाज पर प्रभाव भिन्न प्रकार का होता है — लेकिन ये अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं और वैज्ञानिक सोच को कमज़ोर करते हैं। पाँचवीं श्रेणी है — राजनीतिक और धार्मिक कट्टरपंथ का घालमेल। इसमें आतंकी संगठनों द्वारा धर्म की आड़ में युवाओं को भर्ती करने के लिए सोशल मीडिया का व्यापक उपयोग होता है। यह तथ्य स्थापित है, कि इस्लामिक स्टेट जैसे संगठन ९६ हजार से अधिक ट्विटर खातों के माध्यम से संचालन करते थे।
तकनीक की इस दौड़ में एक नया और अत्यंत खतरनाक आयाम जुड़ा है — डीपफेक और जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। अब किसी भी व्यक्ति की आवाज़ में नकली भाषण बनाना, किसी धार्मिक नेता के मुँह से झूठे शब्द बुलवाना, या किसी पवित्र स्थान की विकृत तस्वीर बनाना — ये सब कुछ मिनटों का काम है। २०२४ में हुए विभिन्न शोधों में यह आशंका व्यक्त की गई कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता सोशल मीडिया पर विषैली सामग्री के प्रसार को हज़ारों गुना बढ़ाने में सहायक बनेगी।
जब एक आम नागरिक अपने स्मार्टफोन पर कोई वीडियो देखता है और उसे वास्तविक मान लेता है।इसमें उसकी बुद्धिमत्ता की कमी नहीं है। यह तकनीकी छल है जिसके सामने सामान्य बुद्धि निहत्थी हो जाती है। यही कारण है कि डीपफेक और एआई-जनित सामग्री इस समय सबसे बड़ी नीतिगत चुनौती है।
भारत में इस समस्या से निपटने के लिए कानूनी प्रावधान तो हैं, लेकिन उनकी सीमाएँ स्पष्ट हैं। आईटी एक्ट २००० की धारा ६७ के अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति पहली बार सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक सामग्री फैलाने का दोषी पाया जाए, तो उसे ३ वर्ष का कारावास और पाँच लाख ₹ तक का जुर्माना हो सकता है। यही अपराध दोहराने पर पाँच वर्ष की जेल और १० लाख ₹ तक का जुर्माना हो सकता है। धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने और २ समुदायों के बीच नफरत फैलाने पर भी मामले दर्ज हो सकते हैं। किसी भी धर्म के देवी-देवताओं की छवियाँ गलत तरीके से प्रसारित करना साइबर अपराध की श्रेणी में आता है, लेकिन जब ९८ प्रतिशत से अधिक सामग्री फेसबुक और यू-ट्यूब से न हटाई जाए, तो यह स्पष्ट है कि कानूनी प्रावधानों का क्रियान्वयन उतना प्रभावी नहीं है जितना होना चाहिए। बहुराष्ट्रीय सोशल मीडिया कंपनियाँ अपने प्लेटफार्म पर नफ़रती सामग्री को हटाने में न केवल ढीली हैं, बल्कि उनके एल्गोरिद्म इस सामग्री को बड़े दर्शकों तक पहुँचाने में भी सहायक होते हैं क्योंकि यह ‘जुड़ाव’ और विज्ञापन राजस्व बढ़ाती है।
सोशल मीडिया पर धार्मिक मिथकों का सबसे दूरगामी और खतरनाक प्रभाव तब होता है जब वे किसी युवा की सोच को आकार देते हैं। राष्ट्रीय जाँच एजेंसी की रिपोर्टों के आधार पर यह तथ्य सामने आया था कि आईएसआईएस से जुड़े होने के आरोप में हिरासत में लिए गए भारतीय युवाओं का एक बड़ा हिस्सा मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग से था तथा स्नातक स्तर तक शिक्षित था — अर्थात् गरीबी या अशिक्षा कट्टरपंथ का एकमात्र कारण नहीं है। सोशल मीडिया पर एक सुनियोजित ढंग से बनाई गई धार्मिक पहचान का संकट, षड्यंत्र के दावे और ‘हम बनाम वे’ की कथाएँ — ये मिलकर एक ऐसी मनोवैज्ञानिक अवस्था उत्पन्न करती हैं, जिसमें हिंसा को न्यायोचित ठहराना आसान हो जाता है। यह केवल इस्लामी कट्टरपंथ का मामला नहीं है। हिंदू, ईसाई, सिख — हर धार्मिक समुदाय में कट्टरपंथी तत्त्व हैं जो सोशल मीडिया को अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल करते हैं।
यहाँ यह स्वीकार करना आवश्यक है कि सोशल मीडिया अपने-आपमें न बुरा है, न भला। वह एक माध्यम है — और हर माध्यम की तरह वह उसके उपयोग से परिभाषित होता है। उसी फेसबुक और व्हाट्सएप पर प्राकृतिक आपदाओं में राहत सामग्री जुटाई जाती है, शिक्षा का प्रसार होता है, और धार्मिक सद्भाव की सुंदर कहानियाँ भी साझा होती हैं, लेकिन इसका उपयोग तभी सकारात्मक हो सकता है जब उपयोगकर्ता यह जानता हो कि किस सूचना को साझा करना उचित है और किसे नहीं।
आज की सबसे आवश्यक बात नागरिक दक्षता है। यह वह कौशल है जो विद्यालयीन पाठ्यक्रम में शामिल होनी चाहिए और जिसे घर-घर में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
सोशल मीडिया कंपनियों का यह तर्क कि वे केवल एक ‘माध्यम’ हैं और उनकी सामग्री के लिए उनकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है — अब वैश्विक स्तर पर अमान्य होता जा रहा है। यूरोपीय संघ के डिजिटल सेवा अधिनियम ने बड़े प्लेटफार्मों पर नफ़रती सामग्री को हटाने की स्पष्ट कानूनी बाध्यता डाली है। भारत में भी सूचना प्रौद्योगिकी नियम २०२१ के अंतर्गत महत्त्वपूर्ण सोशल मीडिया मध्यस्थों के लिए शिकायत निवारण अधिकारी नियुक्त करना और ३६ घंटे के भीतर आपत्तिजनक सामग्री हटाना अनिवार्य किया गया है, लेकिन इंडिया हेट लैब की रिपोर्ट यह सिद्ध करती है कि ये प्रावधान कागज़ पर ही अधिक हैं। यहाँ प्रश्न केवल कानूनी नहीं, नैतिक भी है। जब फेसबुक यह जानता है कि उसके प्लेटफार्म पर नफ़रती भाषण प्रसारितहो रहा है और वह ९८ प्रतिशत से अधिक सामग्री नहीं हटाता — तो क्या वह उस हिंसा का भागीदार नहीं जो उस नफ़रत के परिणामस्वरूप होती है? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर सिलिकॉन वैली के कॉर्पोरेट लॉन्ज में बैठकर नहीं दिया जा सकता।
हर धर्म की अपनी आंतरिक सत्यता है, अपना दर्शन है, अपना सौंदर्य है। हिंदू धर्म का उपनिषदीय ज्ञान, इस्लाम की करुणा और न्याय की अवधारणा, ईसाइयत की क्षमा और प्रेम की शिक्षा, सिख धर्म की सेवा और समता की भावना — ये सब मानवता की अमूल्य धरोहरें हैं लेकिन जब इन महान परंपराओं की आड़ में झूठ परोसा जाए, भय फैलाया जाए, और हिंसा को उकसाया जाए, तब वास्तव में उस धर्म की सबसे बड़ी अवमानना होती है। कोई बाहरी शत्रु किसी धर्म को उतना नुकसान नहीं पहुँचा सकता, जितना कि उसके अपने नाम पर फैलाया गया झूठ।
एक परिपक्व और जागरूक नागरिक का यह दायित्व है कि वह अपने धर्म को पहचाने, लेकिन उस धर्म के नाम पर आने वाले हर संदेश को अंधभाव से स्वीकार न करे। वह पूछे — यह सूचना कहाँ से आई ? इसका स्रोत क्या है ? इसे साझा करने से क्या यह मेरे समाज को जोड़ेगा या तोड़ेगा ? ये सरल प्रश्न ही उस विशाल तंत्र को निष्क्रिय कर सकते हैं जो झूठ की फसल उगाने के लिए आस्था की भूमि का दुरुपयोग करता है। सोशल मीडिया पर धार्मिक मिथकों का यह संकट न केवल कानून का, न केवल तकनीक का, बल्कि मूलतः सामाजिक चेतना का प्रश्न है। और इसका उत्तर भी अंततः उसी चेतना में निहित है।