मजबूरी

स्नेहप्रभा पांडेय 
धनबाद(झारखंड)
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कलुआ रोज उठकर नित्कार्य से निवृत्त होकर चला जाता कोयला काटने,उसी कोयले को बेचकर तो वो घर का खर्च चलाता था।
मुँह अंधेरे में उठकर जाता था,क्योंकि दिन के उजाले में किसी के पकड़ने का डर था। इस तरह की सीख उसके पुलिस-रसूखदार देते थे, क्योंकि उस खनन से सबकी जेब भरती थी।
कलुआ की तरह बहुत मजदूर थे,जो इस तरह के काम में लिप्त थे।
जितना कोयला निकलेगा,उतना फायदा होगा इस तरह से दस से बारह बोरी कोयला निकाल कर साइकिल से सबको दक्षिणा देते हुए डिपो पहुँचाना होता था। उतनी बोरी का उसके हाथ मात्र दो सौ  रूपया आता था। उसमें उसके घर में माँ-बाप,पत्नी तथा बच्चे को लेकर आठ लोग थे। बूढ़े माँ-बाप का दवा-दारू खाना-पीना सब उसी दो सौ रूपया में होता था।
एक दिन कलुआ ने सोचा कि,पत्नी बच्चे को भी ले जाए तो ज्यादा कोयला निकाल पाएंगे  तो पैसे भी ज्यादा आएगा।
यही सोचकर सुबह-सुबह पत्नी और दो बेटों( दस और आठ साल का था)को लेकर निकल गया।
अब इस खान में चारों मिलकर कोयला निकाल रहे थे,तभी बहुत जोर से धमाका हुआ। इसके कारण कोयला धँस गयाऔर कलुआ के दोनों बेटे उसके अंदर दब गए। कलुआ को तो पता था कि कुछ होगा तो भाग जाएंगे,इसलिए पति-पत्नी तो बच गए,लेकिन दोनों बेटे जमींदोज हो गए।
कलुआ और पत्नी का रोते-रोते बुरा हाल था  लेकिन किसी को कुछ बोलना ही मना था,नहीं तो जेल हो जाएगा,इसलिए,आँसू पीने पड़े। अब अपनी करनी पर पाश्चाताप के सिवा कुछ नहीं बचा था।

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