वरदान

विजयकान्त द्विवेदी
नई मुम्बई (महाराष्ट्र)

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हर कदम पर उठ रहे तूफान हैं,
 जिन्दगी फिर भी तू वरदान है।
खुदकुशी करते जो खुद से हारकर,
हो बड़े पर मनुज वे नादान हैं॥
इस भुवन की त्रास है यही मिटानी,
अनसुलझे की छोड़ दो प्रभु पर कहानी।
तुम नैन का नीर चैन मन का गवाँकर,
 क्या करोगे क्लेश कहकर जुबानी॥
हारे हुए हो समस्याओं से,
तुम,करो फिर सामना।
आत्मबल खोना नहीं,
नहीं क्षीण होए कामना॥
प्रगति पंथ के अवरोध का,
पूर्ण शोध कर होना सफल।
मीत मेरे हित है इसमें समाहित,
अहं या आसक्ति नहीं तुम पालना॥
हे अनन्त पथ के पथिक सुन,
किए बिन किंचित व्यथित मन।
हे प्रवासी!भावना या मनोबल
जग में किसी का नहीं तोड़ना॥
मानवी तन त्याग से है मिला,
भले तुझको आज नहीं भान है।
मनुज शास्त्रों में जरा झाँक लो,
जिंदगी यह ईश्वरीय वरदान है॥
दीप-शिखा-सी जिंदगी अम्लान हो,
बिदाई बेला में भी मृदु मुस्कान हो।
करे बाधित मन नहीं संताप से,
पथिक अगम लोक जब प्रस्थान हो ॥
परिचय-मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार के विजयकान्त द्विवेदी की जन्मतिथि ३१ मई १९५५ और जन्मस्थली बापू की कर्मभूमि मोतिहारी चम्पारण (बिहार) है। आपने प्रारंभिक शिक्षा रामनगर(पश्चिम चम्पारण) में प्राप्त की है। फिर स्नातक (बीए)बिहार से और हिन्दी साहित्य में एमए राजस्थान से सेवा के दौरान ही किया। श्री द्विवेदी का कार्यक्षेत्र भारतीय वायुसेना रहा है। आप वायुसेना से (एसएनसीओ) सेवानिवृत्ति के बाद नई मुम्बई (महाराष्ट्र) स्थित खारघर में स्थाई निवासरत हैं। किशोरावस्था से ही कविता रचना में आपकी रुचि रही है, तथा हिन्दी में कविता एवं गीत लिखते हैं। चम्पारण में तथा महाविद्यालयीन पत्रिका सहित अन्य पत्रिका में तब से ही रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। काव्य संग्रह ‘नए-पुराने राग’(दिल्ली से १९८४) प्रकाशित हुआ है। रचनाएँ कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। आपको सम्मान के रुप में नई दिल्ली सहित अन्य प्रकाशन और संस्थाओं से साहित्य की सेवा के लिए सम्मान मिले हैं। राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कृति के प्रति विशेष लगाव रखने वाले श्री द्विवेदी की लेखनी का उद्देश्य-संस्कृत की तरह हिन्दी भी तिरोहित नहीं हो जाए,और अरबी ऊर्दू में नहाकर हिन्दी के नाम पर छा नहीं जाए,जो भारतीत संस्कृति पर धीमें जहर की तरह असरकारी होकर और अधिक हावी न हो। आप हिन्दी में साहित्य के पुरोधाओं .स्व.श्री मैथिलीशरण गुप्त,श्री दिनकर,श्री पन्त श्री निराला,श्री प्रसाद,श्री बच्चन और माखनलाल चतुर्वेदी की राष्ट्रव्यापी साहित्यिक वैचारिकता को प्रश्रयदेकर साहित्य को समृद्ध करने के पक्षधर हैं।

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