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कत्लेआम

सुलोचना परमार ‘उत्तरांचली
देहरादून( उत्तराखंड)
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आज भावनाओं का भी देखो
ऐसे कत्लेआम होता है।
घर में मारकर बीबी को वो,
बाहर खूब जोर से रोता है।
ऐसे कत्लेआम…

बेटी को भी ना छोड़े ये,
ऐसा पिता भी होता है।
लगे धब्बे जो दामन पे,
सरेआम वो धोता है।
ऐसे कत्ले आम…

भाई का भाई ही दुश्मन,
बीज घृणा का बोता है।
आने वाली संतानों का भी,
फिर यही हाल तो होता है।
ऐसे कत्लेआम…

मात-पिता को भूल गए सब,
अब पैसा सब कुछ होता है।
इस पैसे की खातिर सबमें,
रोज घमासान ही होता है।
ऐसे कत्लेआम…

घर में भी तो रोज किसी का,
कत्लेआम ही तो होता है।
मार खाये जो रोज पति की,
दिल भी संग संग रोता है।
ऐसे कत्लेआम…

प्यार का जज़्बा दिखाकर,
भावनाओं का शोषण होता है।
अब वो प्यार कहां है जहां में,
दिल धोखा खाकर रोता है।
ऐसे कत्लेआम…

शिक्षा को भी छोड़ा कहाँ,
यहां भी भ्रष्टाचार होता है।
फर्जी डिग्रियों का खेल भी,
खूब यहां पर होता है।
ऐसे कत्लेआम…

झूठे वादे कर करके वो,
मालामाल ही होता है।
उसके रहमों करम पर है जो,
वो सदा ही रोता है।
ऐसे कत्लेआम…
.

जाति-धर्म में बांट कर सबको,
आराम से जो सोता है।
नागफ़नी का काँटा है वो,
जगह-जगह ये बोता है ।
ऐसे कत्ले आम…

भावनाओं से भावनाओं की,
जंग में जो सब कुछ खोता है।
क्या होगा उस लुटे-पिटे का,
जिसका कोई न होता है।
ऐसे कत्लेआम…होता है॥

परिचय: सुलोचना परमार का साहित्यिक उपनाम ‘उत्तरांचली’ है,जिनका जन्म १२ दिसम्बर १९४६ में श्रीनगर गढ़वाल में हुआ है। आप सेवानिवृत प्रधानाचार्या हैं। उत्तराखंड राज्य के देहरादून की निवासी श्रीमती परमार की शिक्षा स्नातकोत्तर है।आपकी लेखन विधा कविता,गीत,कहानि और ग़ज़ल है। हिंदी से प्रेम रखने वाली `उत्तरांचली` गढ़वाली में भी सक्रिय लेखन करती हैं। आपकी उपलब्धि में वर्ष २००६ में शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय सम्मान,राज्य स्तर पर सांस्कृतिक सम्मान, महिमा साहित्य रत्न-२०१६ सहित साहित्य भूषण सम्मान तथा विभिन्न श्रवण कैसेट्स में गीत संग्रहित होना है। आपकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविता,गीत,ग़ज़ल, कहानी व साक्षात्कार के रुप में प्रकाशित हुई हैं तो चैनल व आकाशवाणी से भी काव्य पाठ,वार्ता व साक्षात्कार प्रसारित हुए हैं। हिंदी एवं गढ़वाली में आपके ६ काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। साथ ही कवि सम्मेलनों में राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर शामिल होती रहती हैं। आपका कार्यक्षेत्र अब लेखन व सामाजिक सहभागिता हैl साथ ही सामाजिक गतिविधि में सेवी और साहित्यिक संस्थाओं के साथ जुड़कर कार्यरत हैं।श्रीमती परमार की रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आती रहती हैंl