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चाय की गुमटी

वीना सक्सेना
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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मॉल में शॉपिंग करते करते दो-ढाई घंटे बीत चुके थे… अजीब-सी थकान हो रही थी,और चाय पीने का मन भी कर रहा था..सामने मॉल के अंदर एक बहुत ही शानदार ए.सी. चाय की शॉप थीl मैंने अपनी दोस्त से कहा कि,चलो पहले हम चाय पी लेते हैं..फिर आगे की शॉपिंग करेंगेl हम चाय की दुकान के अंदर आये..तो देखा शॉप पूरी खचाखच भरी थी..और एक बहुत ही सुंदर ग्रामीण वातावरण का इंटीरियर था…सामने लालटेन टंगी थी,नीचे आरामदायक कुर्सियां, पर लग ऐसा रहा था कि गांव के किसी नुक्कड़ पर चाय पी रहे हैं…l हमने देखा,वहां एक मेनू कार्ड रखा था…जिंजर चाय,तंदूरी चाय ,पुदीना चाय,कुल्हड़ की चाय,प्लेन चाय,इलायची की चाय,लौंग मसाला,चॉकलेट…कम से कम ऐसे पच्चीस तरह की चाय के जायके थे..और उसके आगे उनके भाव भी लिखे थे…l हमने प्लेन चाय मंगाई…एक लड़का हमें चाय दे गयाl बहुत सुंदर से कप सॉसर में, साथ में २ टोस्ट और २ बिस्किट भी रख कर गया। सुंदर कप सॉसर में हमने चाय पी,बिस्किट खाए,और बातें करने लगेl मैंने अपनी दोस्त को बताया कि,जब मेरे बच्चे छोटे थे,और पढ़ते नहीं थे…तो मेरे पति मुझे बहुत डराते थेl कहते थे,तुम्हारे लड़के के लिए तो मैं चाय की गुमटी डलवा दूंगा…मैं बहुत डर जाया करती थी,और सोचा करती थी कि चाय की गुमटी पर क्या तो वह कमाएगा,क्या परिवार को पालेगा,और क्या उसका स्टेटस होगा।
अभी मैं बता ही रही थी कि,सामने से एक सरदार जी अंदर की तरफ आए और उन्होंने आकर मेरे पैर छुए और पूछा-“आप लकी की मम्मा हैं ना!”
मैंने बोला-हाँl
उन्होंने बोला-“आपने मुझे पहचाना..!”
“नहीं कुछ लग तो रहा है,बच्चे बड़े हो जाते हैं तो पहचान में नहीं आते।” मैंने कुछ सकुचाते हुए कहा।
उसने बोला-“मैं हरजीत लकी के साथ क्रिकेट खेला करता था..।” मुझे याद आ गया,यह तो बिल्कुल भी नहीं पढ़ता थाl इसके साथ मेरा बेटा भी बिगड़ रहा था…आज उसे पेंट-शर्ट-टाई में देखकर बड़ा अच्छा लगाl मैंने पूछा-“तुम यहां कैसे ?” उसने बोला-“आंटी अपनी ही शॉप हैl आपके आशीर्वाद से ३ और शॉप हैं शहर के तीन बड़े मॉल मेंl मैं तो बस सुपरविजन करता हूँ…बाकी काम तो मेरे वर्कर्स करते हैं..” “सुनकर बहुत खुशी हुईl”
उसने पूछा-“लकी कहां है..?” मैंने बताया कि वह मल्टीनेशनल कम्पनी में जॉब कर रहा हैl फिर मैंने धीरे से झिझकते हुए उससे पूछा -“बेटा कितनी कमाई हो जाती है ?” उसने बोला आंटी आपके आशीर्वाद से ढाई-तीन लाख महीने के कमा ही लेता हूँ..” सुनकर मेरे कानों में सीटी-सी बजने लगीl इतने में वेटर बिल ले आयाl मैंने बिल जैसे ही उठाया,उसने मना कर दियाl “नहीं आंटी आप ही की शॉप हैl लकी को मेरा नम्बर दीजिएगा,बहुत दिनों से बात नहीं हुई उससे …आंटी फिर आइएगाl” मैं बाहर निकली,मैंने अपनी दोस्त को बताया उससे अच्छा तो मेरा बेटा भी चाय की दुकान ही लगा लेता..कम से कम कम्पनी के हैवी टारगेट से तो बचता…और बुढ़ापे में हमारे साथ तो रहता…अपना काम अपना ही होता है…l

परिचय : श्रीमती वीना सक्सेना की पहचान इंदौर से मध्यप्रदेश तक में लेखिका और समाजसेविका की है।जन्मतिथि-२३ अक्टूबर एवं जन्म स्थान-सिकंदराराऊ (उत्तरप्रदेश)है। वर्तमान में इंदौर में ही रहती हैं। आप प्रदेश के अलावा अन्य प्रान्तों में भी २० से अधिक वर्ष से समाजसेवा में सक्रिय हैं। मन के भावों को कलम से अभिव्यक्ति देने में माहिर श्रीमती सक्सेना को कैदी महिलाओं औऱ फुटपाथी बच्चों को संस्कार शिक्षा देने के लिए राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। आपने कई पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया है।आपकी रचनाएं अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुक़ी हैं। आप अच्छी साहित्यकार के साथ ही विश्वविद्यालय स्तर पर टेनिस टूर्नामेंट में चैम्पियन भी रही हैं। `कायस्थ गौरव` और `कायस्थ प्रतिभा` सम्मान से विशेष रूप से अंलकृत श्रीमती सक्सेना के कार्यक्रम आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर भी प्रसारित हुए हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में अनेक लेख प्रकाशित हो चुके हैंl आपका कार्यक्षेत्र-समाजसेवा है तथा सामजिक गतिविधि के तहत महिला समाज की कई इकाइयों में विभिन्न पदों पर कार्यरत हैंl उत्कृष्ट मंच संचालक होने के साथ ही बीएसएनएल, महिला उत्पीड़न समिति की सदस्य भी हैंl आपकी लेखन विधा खास तौर से लघुकथा हैl आपकी लेखनी का उद्देश्य-मन के भावों को अभिव्यक्ति देना हैl