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चुनावी चकमक-जै खद्दर धारी…

अनुपम आलोक
उन्नाव(उत्तरप्रदेश)
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जै खद्दरधारी,भइया…जै खद्दर धारी,
वरदहस्त हो तुम्हरा…विपत्ति टरै सारीl
भइया…जै खद्दरधारीll

देख चुनावी मौसम…फौरन प्रकट भए,
जीत इलेक्शन भाई,सब-कुछ गटक गएl
जातिवाद के पोषक,शकुनि के अवतारी,
जै खद्दरधारी…भइया जै खद्दरधारीll

तुम हर्षद के पापा…नीरव के यारा,
माल्या जी के वंशज,तुमको धन प्याराl
चारा और यूरिया…व्यापमं बलिहारी,
जै खद्दरधारी…भइया जै खद्दरधारीll

पहला लड़ा इलेक्शन,पास न था धेला,
अब कोठिन पर कोठी,कारों का रेलाl
स्विस बैंक में दौलत,तुम्हरी है सारी,
जै खद्दरधारी…भइया जै खद्दरधारीll

राजनीति कर बाँटे…सब घर-चौबारे,
बुद्धि विनाशक तुमसे,बहुरूपिया हारेl
जिससे खुन्नस खाओ,बिके लुटिया-थारी,
जै खद्दरधारी…भइया जै खद्दरधारीll

परिचय-अनुपम ‘आलोक’ की साहित्य सृजन व पत्रकारिता में बेहद रुचि है। अनुपम कुमार सिंह यानि ‘अनुपम आलोक’ का जन्म १९६१ में हुआ है। बाँगरमऊ,जनपद उन्नाव (उ.प्र.)के मोहल्ला चौधराना निवासी श्री सिंह ने वातानुकूलन तकनीक में डिप्लोमा की शिक्षा ली है। काव्य की लगभग सभी विधाओं में आप लिखते हैं। गीत,मुक्तक व दोहा में विशेष रुचि है। आपकी प्रमुख कृतियाँ-तन दोहा मन मुक्तिका,अधूरी ग़ज़ल(साझा संकलन)आदि हैं। प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में शताधिक रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। आपको सम्मान में साहित्य भूषण,मुक्तक प्रदीप,मुक्तक गौरव,मुक्तक शास्त्री,कुण्डलनी भूषण, साहित्य गौरव,काव्य गौरव सहित २४ से अधिक सम्मान हासिल हुए हैं।