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जरा जल्दी आना

संजय वर्मा ‘दृष्टि’ 
मनावर(मध्यप्रदेश)
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आकाश में जाते मेघ,
जमीन पर गर्म हवाओं
धूल भरी आँधियों के संग,
तुम उड़ रहे
सूखे कंठ लिए।
हर कोई निहार रहा,
पेड़ मानो कह रहे हो
थोड़ा विश्राम कर लो।
हमारे गाँव में भी,
सूखे कुएँ, सूखी नदियों से भी
अब तो गीत नहीं गाया जा रहा,
धूप तेज होने से
बेचारे पत्थरों को,
चढ़ रहा बुखार।
मेहंदी बिन त्योहारों के,
अचानक आ धमकी
पगथली औऱ हाथों में,
कच्ची केरियाँ दे रही आहुति।
तपन के इस लू के खेल में,
सड़कें हुई वीरान
वृक्ष बुला रहे राहगीरों को,
और उस पर रहने वाले रहवासियों को।
वृक्ष के पत्ते,
मेघ से मानों कह रहे हों
ओ मेघा रे,
जरा जल्दी आना।
बस, तुम जरा जल्दी आना,
ताकि मैं तुम्हें ही
गंगाजल मान कर
तुम्हारे शुद्ध जल से तृप्त हो
जीवित रह सकूँ।
जल्दी आओगे ना,
मेरे सखा मेघ॥

परिचय-संजय वर्मा का साहित्यिक नाम ‘दॄष्टि’ है। २ मई १९६२ को उज्जैन में जन्में श्री वर्मा का स्थाई बसेरा मनावर जिला-धार (म.प्र.)है। भाषा ज्ञान हिंदी और अंग्रेजी का रखते हैं। आपकी शिक्षा हायर सेकंडरी और आयटीआय है। कार्यक्षेत्र-नौकरी( मानचित्रकार के पद पर सरकारी सेवा)है। सामाजिक गतिविधि के तहत समाज की गतिविधियों में सक्रिय हैं। लेखन विधा-गीत,दोहा,हायकु,लघुकथा कहानी,उपन्यास, पिरामिड, कविता, अतुकांत,लेख,पत्र लेखन आदि है। काव्य संग्रह-दरवाजे पर दस्तक,साँझा उपन्यास-खट्टे-मीठे रिश्ते(कनाडा),साझा कहानी संग्रह-सुनो,तुम झूठ तो नहीं बोल रहे हो और लगभग २०० साँझा काव्य संग्रह में आपकी रचनाएँ हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में भी निरंतर ३८ साल से रचनाएँ छप रहीं हैं। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में देश-प्रदेश-विदेश (कनाडा)की विभिन्न संस्थाओं से करीब ५० सम्मान मिले हैं। ब्लॉग पर भी लिखने वाले संजय वर्मा की विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-मातृभाषा हिन्दी के संग साहित्य को बढ़ावा देना है। आपके पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद,तो प्रेरणा पुंज-कबीर दास हैंL विशेषज्ञता-पत्र लेखन में हैL देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-देश में बेरोजगारी की समस्या दूर हो,महंगाई भी कम हो,महिलाओं पर बलात्कार,उत्पीड़न ,शोषण आदि पर अंकुश लगे और महिलाओं का सम्मान होL