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त्याग,सत्यता व मिलनसारिता से बनीं ‘स्वर मौली’

गोवर्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’
बीकानेर(राजस्थान)
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सुरों की अमर ‘लता’ विशेष-श्रद्धांजलि….

आध्यात्मिक गुरू विद्या नरसिम्हा भारती द्वारा ‘स्वर मौली’ की उपाधि से सम्मानित स्वर साम्राज्ञी भारत रत्न लता मंगेशकर के खास वाकये साझा करना चाहता हूँ-
भारतीयता व राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत सदैव हँसमुख, दृढ़प्रतिज्ञ लताजी ने १९४२ से अभी तक अर्थात ७ दशक से अधिक समय तक हिंदी,मराठी,तमिल, कन्नड़ और बंगाली समेत ३६ भारतीय भाषाओं में लगभग ३० हजार एकल,युगल या सामूहिक गीत संगीत जगत को दे कर स्वर्गलोक के लिए प्रस्थान किया है।
महान गायिका लताजी ने ५० के दशक में उस समय के सर्वाधिक लोकप्रिय गायक ग़ुलाम मुहम्मद दुर्रानी के व्यवहार के चलते अपमानित महसूस किया। तब बिना समय गँवाए संगीतकार नौशाद साहब को स्पष्ट कर दिया कि,मैं इस शख़्स के साथ गाना नहीं गाऊँगी। उसके बाद उन्होंने जी.एम. दुर्रानी के साथ कभी भी गाना नहीं गया।
लताजी को क्रिकेट खेल से बहुत ज्यादा लगाव था, जो इस तथ्य से विदित होता है कि,जब लताजी ने मीना और उषा के साथ विश्वकप २०११ में पाकिस्तान के खिलाफ अंत के पहले मुक़ाबले के दौरान कुछ खाया-पिया नहीं,अर्थात निर्जल व्रत रखा। पूरे खेल के दौरान भारत की जीत के लिए प्रार्थना की और भारत की जीत के बाद ही अन्न-जल ग्रहण किया।
१९६० के आस-पास इंदौर में एक कार्यक्रम के दौरान ऊंचा सुर लगाते वक्त लताजी को जब उनके स्वर-रज्जु में किसी परेशानी के चलते आवाज फटती महसूस हुई,तब उन्होंने परेशानी इंदौर के मशहूर शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खां से साझा की। खाँ साहब की सलाह अनुसार उन्होंने मुंबई से कुछ समय तक बाहर रह ‘मौनव्रत’ रखा। व्रत की समाप्ति पश्चात ‘बीस साल बाद’ का गीत ‘कहीं दीप जले,कहीं दिल’ गा कर संगीत की दुनिया में वापसी की। इस गीत के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला था।
लताजी सनातनी धार्मिक महिला थीं। वे कृष्ण भक्त थीं और हमेशा ‘श्री कृष्ण’ लिख कर ही लेखन की शुरुआत करती थीं। यही कारण रहा कि भजन गाते वक्त उनके आँसू छलक जाते थे।
लताजी को लंदन के प्रतिष्ठित रॉयल अल्बर्ट हॉल में सीधा(सजीव)प्रसारण प्रस्तुति देने वाली पहली भारतीय कलाकार होने का गौरव प्राप्त है।
लताजी से जुड़े ऐसे अनेक वाकये हैं,जहाँ उनकी शालीनता,विनम्रता की छाप ऐसी है कि,दिग्गज भी उनके सजदे में झुका नजर आए तो अचरज मत करिएगा,क्योंकि उन्होंने अपने त्याग,सत्यता, कर्तव्यनिष्ठता,व्यवहारिकता,मिलनसारिता से एक बहुत बड़ी शख्सियत खड़ी की है। यही कारण है कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के दिग्गज उस्ताद बड़े गुलाम अली के कानों में रियाज करते समय जब लताजी के गाने के बोल पड़े,तब ध्यान से गाना सुन लेने के पश्चात बरबस बोल पड़े -‘कमबख्त,कहीं बेसुरी नहीं होती।’ इसी प्रकार पं. कुमार गंधर्व लिखते हैं-‘जिस कण या मुरकी को कंठ से निकालने में अन्य गायक-गायिकाएं आकाश-पाताल एक कर देते हैं,उसी कण,मुरकी,तान या लयकारी का सूक्ष्म भेद वह अर्थात लताजी बड़ा ही सहज करके फेंक देती हैं।’
संगीत जगत में उनके अतुलनीय योगदान को याद करते हुए उनकी अनन्त यात्रा पर सादर श्रद्धा सुमन अर्पित…।

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