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धरती बचाओ

हेमलता पालीवाल ‘हेमा’
उदयपुर (राजस्थान )
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विश्व धरा दिवस स्पर्धा विशेष………


सिसक रही है धरती माँ,
अश्रुधारा बहा रही है।
भीगा-भीगा आँचल उसका,
दर्द अपना छिपा रही है।

उसके सीने में घाव गहरे,
चुपचाप सहला रही है।
अपनों ने दिए जख्म ऐसे,
मरहम उन पर लगा रही है।

सुबक रही है वो बेचारी,
लोग कर रहे हैं क्यूँ नादानी।
स्वार्थ व लालच में पड़कर,
उजाड़ रहे हैं यह दुनिया सारी।

वन जो थे सारे उजड़ गए,
पर्वत भी सारे कट गए।
नदियों से बजरी खोद डाली,
पाताल भी सारे रौंदे गए।

हरियाला आँचल फट गया,
खेतों से किसान रूठ गया।
होने लगी मनमानी धरती पर,
ईमान से इंसान क्यूँ गिर गया।

गर नहीं बची धरती माँ तो,
हम भी न कभी बच पाएँगे।
अपने पैरों तले रौंद रहे हो,
कैसे हम धरती बचा पाएँगे।

निर्मम,निर्दय न बनो सभी,
धरती माँ की कद्र कर लो।
माँ है हमारी सबकी प्यारी,
इसकी रक्षा का प्रण ले लो।

नदी,पर्वत वन यह सारे,
माँ का रूप निखारते हैं।
देते हमें प्राण वायु वृक्ष,
जड़ से क्यूँ हम उखाड़ते हैं।

शपथ धरती की आज खाओ,
दरिंदों के हाथों इसे बचाओ।
अवैध खनन करने वालों कुछ,
धरती पर तुम अब रहम खाओ॥

परिचय – हेमलता पालीवाल का साहित्यिक उपनाम – हेमा है। जन्म तिथि -२६ अप्रैल १९६९ तथा जन्म स्थान – उदयपुर है। आप वर्तमान में सेक्टर-१४, उदयपुर (राजस्थान ) में रहती हैं। आपने एम.ए.और बी.एड.की शिक्षा हासिल की है। कार्यक्षेत्र-अध्यापन का है। लेखन विधा-कविता तथा व्यंग्य है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-  साहित्यिक व सामाजिक सेवा है।