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नाहक ही मत ढूँढो खुशबू

ओम अग्रवाल ‘बबुआ’
मुंबई(महाराष्ट्र)
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चाह रहे हैं जग में हमको,मान और सम्मान मिले,
बल वैभव हो मान प्रतिष्ठा,और उचित पहचान मिले।
किन्तु समर्पण में बोलो कब,हमने जीवन हारा है,
कहाँ हृदय से चाहा हमने,भारत जाँ से प्यारा है॥

 

महज दिखावे की खातिर हम,भारत की जय गाते हैं,
और दिखावे की खातिर हम,थोथे गाल बजाते हैं।
बहू-बेटियां नहीं सुरक्षित,सड़कों पर बाजारों में,
कितनी मारी गईं कोख में, सम्मानित परिवारों में॥

 

लाज जिन्हें आती है अपनी,माँ का चरण दबाने में,
आज दौड़ में आगे हैं वे,मान-प्रतिष्ठा पाने में।
बड़े-बड़ों का हमने घर में,बोलो कितना मान किया,
और वतन की खातिर बोलो,हमने क्या बलिदान किया॥

 

छल दंभ द्वेष पाखंड झूठ से,मान खरीदा जाता है,
दीन-दु:खी के आँसू का,बलिदान खरीदा जाता है।
प्रतिबिंब प्रतिष्ठा का देखो तुम,अपने स्वयं उसूलों में,
‘नाहक ही मत ढूँढो खुशबू’,तुम कागज के फूलों में॥

 

मानवता जब उग आएगी,प्रियवर तेरी निष्ठा में,
नेह नयन में पुष्प खिलेंगे,तेरी मान प्रतिष्ठा में॥

परिचय-ओमप्रकाश अग्रवाल का साहित्यिक उपनाम ‘बबुआ’ है।आप लगभग सभी विधाओं (गीत, ग़ज़ल, दोहा, चौपाई, छंद आदि) में लिखते हैं,परन्तु काव्य सृजन के साहित्यिक व्याकरण की न कभी औपचारिक शिक्षा ली,न ही मात्रा विधान आदि का तकनीकी ज्ञान है।आप वर्तमान में मुंबई में स्थाई रूप से सपरिवार निवासरत हैं ,पर बैंगलोर  में भी  निवास है। आप संस्कार,परम्परा और मानवीय मूल्यों के प्रति सजग व आस्थावान तथा देश-धरा से अपने प्राणों से ज्यादा प्यार है। आपका मूल तो राजस्थान का झूंझनू जिला और मारवाड़ी वैश्य है,परन्तु लगभग ७० वर्ष पूर्व परिवार उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में आकर बस गया था। आपका जन्म १ जुलाई को १९६२ में प्रतापगढ़ में और शिक्षा दीक्षा-बी.कॉम.भी वहीं हुई है। आप ४० वर्ष से सतत लिख रहे हैं।काव्य आपका शौक है,पेशा नहीं,इसलिए यदा-कदा ही कवि मित्रों के विशेष अनुरोध पर मंचों पर जाते हैं। लगभग २००० से अधिक रचनाएं आपने लिखी होंगी,जिसमें से लगभग ७०० का शीघ्र ही पाँच खण्डों मे प्रकाशन होगा। स्थानीय स्तर पर आप कई बार सम्मानित और पुरस्कृत होते रहे हैं। आप आजीविका की दृष्टि से बैंगलोर की निजी बड़ी कम्पनी में विपणन प्रबंधक (वरिष्ठ) के पद पर कार्यरत हैं। कर्नाटक राज्य के बैंगलोर निवासी श्री  अग्रवाल की रचनाएं प्रायः पत्र-पत्रिकाओं और काव्य पुस्तकों में  प्रकाशित होती रहती हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-जनचेतना है।