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पाठक को बांधे रखती है ‘मैं डॉक्टर नहीं हूँ’कहानी-श्री तिवारी

भोपाल (मप्र)।

आज कहानी संवाद में पढ़ी गई दोनों कहानियाँ मनोविज्ञान पर आधारित हैं। शकुंतला मित्तल की कहानी ‘मैं डॉक्टर नहीं हूँ’, भ्रम और स्मृति के बीच के अंतर को रेखांकित करती है। मनोविज्ञान जैसे कथानक पर कहानी लिखना बहुत कठिन है। उसके लिए कहानीकार को एक मनोचिकित्सक की भांति उपचार करना पड़ता है। यह कहानी पाठक को बांधे रखती है।
        यह बात मुख्य अतिथि रामगोपाल तिवारी भावुक ने दोनों कहानियों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कही। अवसर रहा अंतर्राष्ट्रीय विश्वमैत्री मंच के अभिनव आयोजन कहानी संवाद ‘दो कहानी-दो समीक्षक’ का, जो शनिवार की शाम को आभासी रूप से आयोजित किया गया। अध्यक्षता कर रही मंच की संस्थापक अध्यक्ष संतोष श्रीवास्तव ने पढ़ी गई दोनों कहानियों और उन पर की गई समीक्षाओं की सराहना करते हुए कहा कि आज की दोनों कहानियाँ कथा लेखिकाओं की बेहतरीन कहानियाँ हैं। २१वीं सदी में स्त्री कथाकारों की विकसित होती लंबी श्रृंखला है। आज ऐसे कई जरूरी स्त्री हस्ताक्षर कथा परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी लिखी कथाएं आज पाठकों की पहली पसंद है। उनकी यह जीवंत व महत्वपूर्ण उपस्थिति किसी कथित साहित्य शक्ति पुरुष की देन या किसी और के द्वारा दिलाया गया स्थान नहीं है बल्कि स्वयं उनकी हस्तक्षेप भरी रचनाधर्मिता, सक्रियता और श्रम से उपलब्ध मुकाम है।
 विशिष्ट अतिथि लक्ष्मीकांत जवणे ने रेणुका अस्थाना की कहानी ‘दादी की सोनहँस’ की समग्र विवेचना करते हुए कहा कि मन में करुणा का भाव आने पर भीतर ऑक्सीटोसिन हार्मोन बहता है। इस हार्मोन के अभाव में आदमी पत्थर जैसा हुआ जा रहा है। कथ्य-कलेवर, सजीव, सलय, सरोकारऔर संतुलन जैसे प्रतिमानों पर रेणुका अस्थाना की कहानी खरी उतरती है।
   वरिष्ठ कहानीकार राज बोहरे ने दोनों कहानियों के अनकहे पहलुओं पर चर्चा की। उन्होंने इस सम्भावना से इनकार नहीं किया कि शकुंतला मित्तल की कहानी में केंद्रीय भूमिका में यदि डॉक्टर अपने पेशे से ईमानदारी नहीं बरतता तो मरीज का शोषण होना निश्चित था। रानी सुमिता ने रेणुका अस्थाना की कहानी पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस कहानी में बाल मनोविज्ञान उभर कर आया है। डॉ. कर्नल गिरजेश सक्सेना चूँकि पेशे से डॉक्टर हैं। इसलिए उन्होंने एक मनोचिकित्सकीय दृष्टिकोण रखा और अपने अनुभव साझा कर वातावरण को संवेदनशील बना दिया। साहित्यकार अर्चना पंड्या ने अपने ही अंदाज़ में सभी का स्नेहिल स्वागत किया।
      कार्यक्रम का संचालन मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी ने किया। साहित्यकार रत्ना पाण्डे ने आत्मीय आभार व्यक्त किया।