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पुनः मन की सुन लूँ

राजू महतो ‘राजूराज झारखण्डी’
धनबाद (झारखण्ड) 
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मन कुछ कहता है…(‘विश्व इच्छा दिवस’ विशेष)…

मन कुछ कहता है…
दिमाग की सुने बगैर
होंठों के साथ बिना,
आँखों से झलकता है
मन कुछ कहता है…।

दुनिया से थक-हार कर,
शहरी भाग-दौड़ से दूर
जिम्मेदारियों का बोझ ले,
अहम की दीवार तोड़
मन कुछ कहता है…।

मन कुछ कहता है…
कहता है लौट चलें
चलें बचपन के गाँव में,
माता-पिता की छाँव में
अमन, शान्ति, प्रेम-भाव में।

लगता है पुनः मन की सुन लूँ,
लाभ-हानि के भाव को छोड़कर
कुछ भी कहे बिना कुछ भी सुने बिना,
सभी मेरी भावनाओं को समझ लें
सबकी भावनाओं को मैं समझ लूँ।

मन कुछ कहता है…
कहता है इस दुनिया से
मिटा दो ईर्ष्या, द्वेष और नफरत,
रण छोड़ सारे देश पुनः एक हो जाएँ
मानव मानवीय प्रेम में सराबोर हो जाएँ।

मन कुछ कहता है…,
मन कुछ कहता है…॥

परिचय-साहित्यिक नाम `राजूराज झारखण्डी` से पहचाने जाने वाले राजू महतो का निवास झारखण्ड राज्य के जिला धनबाद स्थित गाँव-लोहापिटटी में है। जन्म तारीख १० मई १९७६ और जन्म स्थान धनबाद है। भाषा ज्ञान-हिन्दी का रखने वाले श्री महतो ने स्नातक सहित एलीमेंट्री एजुकेशन (डिप्लोमा) की शिक्षा प्राप्त की है। साहित्य अलंकार की उपाधि भी हासिल है। आपका कार्यक्षेत्र-नौकरी (विद्यालय में शिक्षक) है। सामाजिक गतिविधि में आप सामान्य जनकल्याण के कार्य करते हैं। लेखन विधा-कविता एवं लेख है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-सामाजिक बुराइयों को दूर करने के साथ-साथ देशभक्ति भावना को विकसित करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-प्रेमचन्द जी हैं। विशेषज्ञता-पढ़ाना एवं कविता लिखना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी हमारे देश का एक अभिन्न अंग है। यह राष्ट्रभाषा के साथ-साथ हमारे देश में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। इसका विकास हमारे देश की एकता और अखंडता के लिए अति आवश्यक है।