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बनो जीवन नैया पतवार

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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रचनाशिल्प:मात्रिक छंद वर्ण १६-१६=३२…


बहुत ही प्यारा है परिवार,
भरा-पूरा है घर-संसार
बुजुर्गों की है इस पर छाँव,
पिता खेते हैं घर की नाव
तुम्हीं अब हो सबके आधार,
बनो जीवन नैया पतवार।

निभाना तुम जीवनभर साथ,
छोड़ना कभी न इनका हाथ
सभी हैं रिश्ते ये अनमोल,
न देना तुम दौलत से तोल
बाँट कर जी भर सबमें प्यार,
बनो जीवन नैया पतवार।

रहना धर्म में निष्ठावान,
भले ही हो संकट में जान
हमेशा राह सत्य की चलना,
बेशक पड़े आग में जलना
कभी भी होना मत लाचार,
बनो जीवन नैया पतवार।

जीवन सरल नहीं है जीना,
पड़ता ज़हर हमेशा पीना
दुनिया कभी न बढ़ने देगी,
सपने नये न गढ़ने देगी
रह कर दुनिया से हुँशियार,
बनो जीवन नैया पतवार।

सब विपदाओं से लड़ जाना,
बाधाओं से मत घबराना
बस आगे ही बढ़ते जाना,
अपनी मंजिल तुमको पाना।
सभी बाधाएँ करके पार,
बनो जीवन नैया पतवार॥

परिचय-शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है