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बुनियाद कमजोर है क्या ?

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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हिंदी और हमारी जिंदगी…

सौ बरस से अधिक का समय हो गया-हिंदी को राष्ट्रभाषा का अधिकार मिलना चाहिए, पर आज भी हिंदी सिर्फ हिंदी मानने वालों के कारण बची है। महात्मा गाँधी ने १९१८ में अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि हिंदी को राष्ट्रभाषा का अधिकारी भाषा घोषित करना और दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार -प्रसार का अनुष्ठान करना है।
“नर हो न निराश करो मन को, कुछ काम करो कुछ काम करो” ये शब्द हमें हर बार पढ़ते-पढ़ते धिक्कारते हैं कि काम में सफलता क्यों नहीं मिलती ? क्या हमारे प्रयास लक्ष्य को पाने में असफल हैं ? क्या हम इतने स्वाभिमानी नहीं हैं ? क्या हम अब भी पराधीन हैं ? क्या हमें काले अंग्रेजों से फिर लड़ना होगा ? जब लड़ने वाले खुद शासक के साथ हैं, तो हमारा हश्र क्या होगा ? हमें कब तक भीख मांगना होगी ? हमें कब तक लड़ना होगा ? कैसे लड़ना होगा ?
आज भी हिंदी के समाचार पत्रों में आवेदन अंग्रेजी भाषा में मंगाया गया! बिलकुल ठीक जैसे शराबबंदी की दलील शराब पीने वाला कर रहा है कि शराब पीने से बहुत लाभ हैं। सिगरेट बंद करने वाला कहता हैं कि सिगरेट पीने से ३ फायदा- पहला घर में चोरी नहीं होती, कुत्ता नहीं काटता और बुढ़ापा नहीं आता! इसी प्रकार जब गंगोत्री ही अपवित्र हो गई, तब गंगा कहाँ तक पवित्र होंगी! कारण जहाँ से हिंदी का बिगुल बजाना है, वहां से अंग्रेजी का गुणगान है रहा है।
हिंदी की लड़ाई लड़ते हुए लगभग सौ बरस से अधिक हो गए कि, राष्ट्र भाषा बने, हिंदुस्तान की, भारत की, पर हम न भारतीय हो पाए, न हिंदुस्तानी हो पाए और हम हो गए अधकचरे इंडियन। हम क्या थे, क्या हैं और क्या हो रहे! किससे न्याय की भीख मांगें ? जहाँ बेदर्द हाकिम हो, वहां फरियाद क्या करना!

हमारे हाकिम असल में पहले के विदेशों में पढ़े थे। विदेशी भाषा पढ़े थे, तो उनकी विदेशी मानसिकता हो गई। यहाँ कोई बुराई नहीं है। ज्ञान के लिए भाषा का कोई बंधन नहीं। कारण कि, हमें अपने मस्तिष्क के खिड़की-दरवाजे हमेशा खुले रखना चाहिए, पर इतने खुले नहीं कि धूल, कचरा हमारे घर- आँगन को गन्दा कर दे। आज की स्थिति यह है कि, विश्व में संपर्क भाषा के लिए अंग्रेजी अनिवार्य है तो फिर चीन, जापान, रशिया आदि देशों में क्यों नहीं अनिवार्य है! हम अब भी गुलामी से मुक्त नहीं हो पाए! हम दूसरों की बैसाखी पर चल कर आगे बढ़ना चाहते हैं, और शायद बढ़ गए, और इतने आगे निकल गए कि, शायद वापिस आना संभव नहीं है। अंग्रेजी भाषा का प्रभुत्व इतना अधिक हो गया है कि वह देश की भाषाओं की महारानी हो गई और अन्य भाषाएँ उसकी चेरी बन गई है।
अब हिंदी अधकच्चे आम के समान है। पता नहीं कब आम पकेगा, पर इस देश में हिंदी के आसार नहीं हैं आने के, तो हम हिंदी प्रेमियों, साहित्यकारों-रचनाकारों को मूक दर्शक बन भाषा की गुलामी स्वीकार कर लेना चाहिए! अब तक जितना सृजन किया आपने, वह शासक के साथ धोखा किया, राजद्रोह किया अंग्रेजी जैसे विक्टोरिया का अपमान किया! क्यों न सब पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाए! क्यों ? अंग्रेजों के समय उनकी बगावत करने का क्या इल्ज़ाम होता!
खैर, अब बात करने, विरोध करने का कोई अर्थ नहीं है। जब अंग्रेजी को राज्याश्रय मिल चुका है तो अब हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने का विचार त्याग देना क्या उचित नहीं होगा ?, और हिंदी राष्ट्र भाषा यदि बन भी जाएगी तो हमारे लिए कौन-से गौरव की बात होगी ? महात्मा गाँधी और अन्य लोगों ने व्यर्थ में स्वाधीनता का आंदोलन कर देश को स्वत्रन्त्र कराया। इससे क्या फायदा हुआ ? अभी भी पुराने लोग कहते हैं कि अंग्रेजों का ज़माना अच्छा था। कम से कम न्याय तो मिलता था, सस्ता था, पर अब तो हम और अधिक गुलाम हो गए।
अब हमें पुरानी विरासत पर गर्व करने का कोई अधिकार नहीं है। जब उनका मूल्यांकन नहीं होना है, तब क्यों हम उसकी सेवा करें ?जिन्होंने अंग्रेजी की सेवा की, उनको मेवा मिल रहा है। एक दिन संयुक्त राष्ट्र में भाषण देने से हिंदी का विकास झूठी-कोरी कल्पना है। जब तक जन-जन की भाषा को उचित साथ नहीं मिलेगा, तब तक हमारी प्रतिष्ठा बिना नींव की होगी। हम कितने भी मंज़िल भवन बना लें, पर वह बेबुनियाद कहलाएंगी।
हमारे दक्षिणी राज्य व्यर्थ में हिंदी का विरोध करते हैं, पर उनकी सोच भी गलत नहीं है। हम हिन्दीवासी उनकी भाषा को अंगीकार, स्वीकार और सीखते भी नहीं हैं, जबकि तमिल, तेलगु आदि भाषाओं में भी वृहद ज्ञान भरा पड़ा है। हमें एक-दूसरे की भाषा का आदर करना चाहिए, और संकीर्ण मानसिकता को त्याग कर हिंदी जो जनभाषा है, उसे राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाना चाहिए।
इससे समझ में आ गया हिंदी को राष्ट्र भाषा होना बहुत कठिन है, पर हम अपनी माँ, भाषा हिंदी की सेवा में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे और जहाँ-जहाँ सरकार की खामियां हों, उनको उजागर कर सरकार को मज़बूर करेंगे। हिंदी राष्ट्र भाषा बनेगी, उस दिन का इंतज़ार करेंगे।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।