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भारत की आत्मा है हिन्दी

सुशीला रोहिला
सोनीपत(हरियाणा)
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हिंदी  दिवस स्पर्धा विशेष………………..


मानव शरीर की रचना अनेक तंत्र-तंत्रिकाओं, मांस-पेशियों तथा पांच आंतरिक ज्ञानेन्द्रियों एवं पांच बाहरी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा हुई है,लेकिन इसकी सुन्दरता तब तक है,जब तक इसमें आत्मा का संचालन हैl प्राणविहीन प्राणी का जीवन निष्क्रिय है,क्योंकि उसका अस्तित्व मिट चुका है। अस्तित्व का जीवंत संबंध प्राण से है। इसी प्रकार हमारे देश की प्राण शक्ति हमारी हिन्दी भाषा है। भारत माता का प्राण हिन्दी भाषा है। भारत माता के नागरिक इसका अभिन्न अंग हैं। जब अंगों को शरीर से अलग कर दिया जाता है,तो शरीर जीवंत तो रहता है,लेकिन वह जीवन के रस भरे आनंद से वंचित रहता है। हमारी हिन्दी भाषा हमारी भारत माता के विकास का स्रोत है। इसका गौरव है। जब भारत के नागरिक भारत माता की आत्मा से अलग होंगे तो,उनके विकास की सद्वृतियों का मार्ग अवरूद्ध होकर बंद हो जाएगा और मानवता भौतिकवाद की अग्नि में जल कर राख का ढेर बन जाएगी।
#हिन्दी भाषा का इतिहास-
हिन्दी भाषा का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना माना गया है। सामान्यतः प्राकृत
की अन्तिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिन्दी साहित्य का अविर्भाव स्वीकार किया जाता है। उस समय अपभ्रंश के कई रूप थे और उनमें सातवीं-आठवीं शताब्दी से ही ‘पद्य’ रचना प्रारम्भ हो गयी थी। हिन्दी भाषा व साहित्य के जानकार अपभ्रंश की अंतिम अवस्था ‘अवहट्ट’ से हिन्दी का उदभव स्वीकार करते हैं। चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ ने इसी अवहट्ट को ‘पुरानी हिन्दी’ नाम दिया।
#राजभाषा का दर्जा कब मिला-
१५ अगस्त १९४७ को भारत स्वतंत्र हुआ। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा १९१७ में गुजरात में सर्वप्रथम राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को मान्यता प्रदान की गई थी। तत्पश्चात १४ सितम्बर १९४९ को संविधान सभा ने एकमत से हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिए जाने का निर्णय लिया। १९५० में संविधान के अनुच्छेद ३४३(१) द्वारा हिन्दी को देवनागरी लिपि में राजभाषा का दर्जा दिया गया। १४ सितम्बर १९५३ को हिन्दी भाषा को हिन्दी दिवस के रूप में पारित किया गया।
#लिपि-
हिन्दी को देवनागरी लिपि में लिखा जाता है। इसे नागरी नाम से भी पुकारा जाता है। देवनागरी में ११ स्वर और ३३ व्यंजन हैं और अनुस्वार,अनुनासिक एवं विसर्ग होता हैl इसे बायें से दाईं ओर लिखा जाता है।
#हिन्दी भाषा का स्वरूप-
हिन्दी भाषा के स्वरूप(अपना रूप)की बात की जाए तो मनुष्य को तो अपना चेहरा देखने के लिए स्वच्छ दर्पण की आवश्यकता होती है,वह तब अपने चेहरे को देख सकता है। इसी प्रकार हमें अपनी भारतीयता रूपी चेहरे को देखने के लिए हिन्दी भाषा रूपी शीशे की आवश्यकता है,क्योंकि हिन्दुस्तान की पहचान हिन्दी शब्द से ही है। हिन्दी भाषा में मन की स्वच्छता के तत्व छिपे हुए हैं,जैसे-दया,करूणा,आदर, सचरित्रता,प्रेम-भाव, साहस,हौंसला,वीरता,सदभावना,सद्कार्य करने का भाव,मैत्रीपन,भारत माता को विश्वगुरु बनाने की हार्दिक संभावना है।
#मानवता का ज्ञान-
हिन्दी भाषा का हिन्दी साहित्य उसका अपना स्वरूप है,जो प्रत्येक मानव को मानवीय मूल्यों का बोध कराता है,और मानवता सिखाई है।
#हिन्दी भाषा के तत्व का घटता रूप-
पाश्चात्य भाषा के रंग से हिन्दी भाषा का घटता घनत्व आज चिंता का विषय हैl हमारा समाज पाश्चात्य सभ्यता की चपेट में आकर अपने-आपको खोखला कर रहा है। हम अपनी सभ्यता और संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। अंग्रेजी भाषा या अन्य भाषा के महत्व ने हमारी हिन्दी भाषा को ग्रहण लगा दिया है। बचपन से ही बच्चों को अंग्रेजी भाषा के प्रति जागरूक किया जाता है। प्रत्येक शाला, महाविद्यालय,विश्वविद्यालय में सभी पाठयक्रमों को अंग्रेजी भाषा से संलग्न किया जाता हैl यह सर्वथा अनुचित है। आज छोटे-छोटे बच्चों को अपनी मातृभाषा से वह प्रेम नहीं रहा,जितना अंग्रेजी भाषा से करते हैं। विद्यालयों के मुखिया,अभिभावकगण और
अध्यापक सभी यह चाहते हैं कि उनके बच्चे इंग्लिश में पारंगत हों। हिन्दी भाषा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता कि,अपनी भाषा को हम पहले बच्चों को सिखाएं।
#हर जुबान पर हो हिन्दी-
“सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा,
हिन्दी हैं हम वतन है हिंदुस्तान हमारा।
हर जुबान पर हो हिन्दी,विश्व में हो हिन्दी भाषा का उजियारा,
आओ सब मिलकर मनाएं,अंतर्राष्ट्रीय हो हिन्दी दिवस हमाराll
#विश्लेषण-
भारत भौतिकवाद के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हो गया है लेकिन सामाजिक और सभ्यता-संस्कृति की दृष्टि से पिछड़ रहा है।किसी भी देश के विकास का आधार वहां की भाषा पर टिका हुआ है। भारत माता का विकास भारत की राजभाषा मातृभाषा हिन्दी पर टिका हुआ हैl जब भी किसी देश ने जब दूसरे देश पर शासन करने की योजना बनाई ,पहले उसकी भाषा को बदल कर उसे कमजोर किया हैl अपनी भाषा को विस्तार रूप में वितरित किया और भाषा,सभ्यता, संस्कृति की बदौलत ही वहां पर अपना साम्राज्य स्थापित किया। आज भले ही भारत ने तकनीक के माध्यम से चाँद पर अपनी पैठ जमा ली है,लेकिन अपनी हिन्दी भाषा को बढ़ावा देने के लिए या उसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। पूर्व सरकारों ने भी हिन्दी भाषा के प्रति चुप्पी साध ली है। अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का गौरव अपनी हिन्दी भाषा में दिए गए ओजस्वी भाषणों के माध्यम से बढ़ाया है। आज हिंदुस्तान की जय-जयकार के नारे पूरी दुनिया में गूंज रहे हैं। हम सब भारतीयों का एक ही नारा है-
“हिन्दी भाषा से विकास हमारा होना,
सदभावना की भावना से
भारतमाता को विश्व गुरु बनाना है।
आओ हिन्दी बोलें,हिन्दी लिखें,
हिन्दी हो प्यार,हिन्दी हमारी मातृभाषा है
मातृभाषा का हो सम्मान,भारत हमारा बने महान॥”

परिचय-सुशीला रोहिला का साहित्यिक उपनाम कवियित्री सुशीला रोहिला हैl इनकी जन्म तारीख ३ मार्च १९७० और जन्म स्थान चुलकाना ग्राम हैl वर्तमान में आपका निवास सोनीपत(हरियाणा)में है। यही स्थाई पता भी है। हरियाणा राज्य की श्रीमती रोहिला ने हिन्दी में स्नातकोत्तर सहित प्रभाकर हिन्दी,बी.ए., कम्प्यूटर कोर्स,हिन्दी-अंंग्रेजी टंकण की भी शिक्षा ली हैl कार्यक्षेत्र में आप निजी विद्यालय में अध्यापिका(हिन्दी)हैंl सामाजिक गतिविधि के तहत शिक्षा और समाज सुधार में योगदान करती हैंl आपकी लेखन विधा-कहानी तथा कविता हैl शिक्षा की बोली और स्वच्छता पर आपकी किताब की तैयारी चल रही हैl इधर कई पत्र-पत्रिका में रचनाओं का प्रकाशन हो चुका हैl विशेष उपलब्धि-अच्छी साहित्यकार तथा शिक्षक की पहचान मिलना है। सुशीला रोहिला की लेखनी का उद्देश्य-शिक्षा, राजनीति, विश्व को आतंकवाद तथा भ्रष्टाचार मुक्त करना है,साथ ही जनजागरण,नारी सम्मान,भ्रूण हत्या का निवारण,हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा बनाना और भारत को विश्वगुरु बनाने में योगदान प्रदान करना है। लेखन में प्रेरणा पुंज-हिन्दी है l आपकी विशेषज्ञता-हिन्दी लेखन एवं वाचन में हैl