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भारत की प्राचीन जल संस्कृति को जीवंत करें

ललित गर्ग
दिल्ली
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जल प्रदूषण एवं पीने के स्वच्छ जल की निरन्तर घटती मात्रा को लेकर बड़े खतरे खड़े हैं। धरती पर जीवन के लिए जल सबसे जरूरी वस्तु है, जल है तो जीवन है। जल ही किसी भी प्रकार के जीवन और उसके अस्तित्व को संभव बनाता है। जीव मंडल में पारिस्थितिकी संतुलन को यह बनाए रखता है। पीने, नहाने, ऊर्जा उत्पादन, फसलों की सिंचाई आदि बहुत उद्देश्यों को पूरा करने के लिए स्वच्छ जल बहुत जरूरी है। जिन ५ तत्वों को जीवन का आधार माना गया है, उनमें से १ तत्व जल है। जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। मानव एवं जीव-जन्तुओं के अलावा जल कृषि के सभी रूपों और अधिकांश औद्योगिक उत्पादन प्रक्रियाओं के लिए भी बेहद आवश्यक है, परंतु आज पूरी दुनिया जल-संकट के साए में खड़ी है। अनियोजित औद्योगिकीकरण, बढ़ता प्रदूषण, घटते रेगिस्तान एवं हिमखंड, नदियों के जलस्तर में गिरावट, पर्यावरण विनाश, प्रकृति के शोषण और इनके दुरुपयोग के प्रति असंवेदनशीलता पूरे विश्व को एक बड़े जल संकट की ओर ले जा रही है। आप सोच सकते हैं कि एक मनुष्य अपने जीवन काल में कितने पानी का उपयोग करता है, किंतु क्या वह इतने पानी को बचाने का प्रयास करता है ?
दुनिया की आबादी ८ अरब से अधिक हो चुकी है। इसमें से लगभग आधे लोगों को साल में कम से कम एक महीने पानी की भारी कमी का सामना करना पड़ता है। जलवायु परिवर्तन के कारण २००० से बाढ़ की घटनाओं में १३४ प्रतिशत वृद्धि हुई है और सूखे की अवधि में २९ प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। पानी के संरक्षण और समुचित उपलब्धता को सुनिश्चित कर हम पर्यावरण को भी बेहतर कर सकते हैं तथा जलवायु परिवर्तन की समस्या का भी समाधान निकाल सकते हैं। पैकेट व बोतल बन्द पानी आज विकास के प्रतीक चिह्न बनते जा रहे हैं और अपने संसाधनों के प्रति हमारी लापरवाही अपनी मूलभूत आवश्यकता को बाजारवाद के हवाले कर देने की राह आसान कर रही है। विशेषज्ञों ने जल को उन प्रमुख संसाधनों में शामिल किया है, जिन्हें भविष्य में प्रबंधित करना सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य होगा। सदियों से निर्मल जल का स्त्रोत बनी रहीं नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, जल संचयन तंत्र बिगड़ रहा है, और भू-जल स्तर लगातार घट रहा है।
धरती पर सुरक्षित और पीने के पानी के बहुत कम प्रतिशत के आंकलन द्वारा जल संरक्षण या जल बचाओ अभियान हम सभी के लिए बहुत जरूरी हो चुका है। जल को बचाने में अधिक कार्यक्षमता लाने के लिए सभी औद्योगिक इमारतों, अपार्टमेंट्स, शालाओं, अस्पतालों आदि में भवन निर्माताओं द्वारा उचित जल प्रबंधन व्यवस्था को बढ़ावा देना चाहिए। पीने के पानी या साधारण पानी की कमी द्वारा होने वाली संभावित समस्या के बारे में आम लोगों को जानने के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाया जाना चाहिए। पानी धरती पर जीवन के अस्तित्व के लिए आधारभूत आवश्यकता है। आबादी में वृद्धि के साथ पानी की खपत बेतहाशा बढ़ी है, लेकिन पृथ्वी पर साफ पानी की मात्रा कम हो रही है। जलवायु परिवर्तन व बढ़ते तापमान ने इसे गंभीर संकट बना दिया है। दुनिया के कई हिस्सों की तरह भारत भी जल संकट का सामना कर रहा है। वैश्विक जनसंख्या का १८ प्रतिशत हिस्सा भारत में निवास करता है, लेकिन ४ प्रतिशत जल संसाधन ही हमें उपलब्ध है।
भारत में जल-संकट की समस्या से निपटने के लिए प्राचीन समय से जो प्रयत्न किए गए, वे दुनिया के लिए मार्गदर्शक हैं। देश के ७ राज्यों की ८२२० ग्राम पंचायतों में भूजल प्रबंधन के लिए अटल भूजल योजना चल रही है। स्थानीय समुदायों के नेतृत्व में चलने वाला यह दुनिया का सबसे बड़ा कार्यक्रम है, साथ ही नल से जल, नदियों की सफाई, अतिक्रमण हटाने जैसे प्रयास हो रहे हैं। जल संरक्षण की दिशा में ब़ड़ी पहल करते हुए केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने इस वर्ष राज्यों के जल मंत्रियों का सम्मेलन किया था। इसके उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उचित ही रेखांकित किया कि सभी राज्यों को मिलकर काम करना होगा तथा जल संरक्षण एवं उपयोग किए गए पानी को फिर से इस्तेमान में लाने के उपाय करने होंगे। हमारे यहां जल बचाने के मुख्य साधन नदी, ताल एवं कूप हैं। इन्हें अपनाओ, रक्षा करो, अभय दो, इन्हें मरुस्थल के हवाले न करो। अन्तिम समय यही तुम्हारे जीवन और जीवनी को बचाएंगे आज आवश्यकता इस बात की है कि जल सरंक्षण की मूल भावना को अपने दैनिक जीवन में उतारकर हर व्यक्ति, हर दिन जल संरक्षण का यथासंभव प्रयास करे।
गाँव के स्तर पर लोगों के द्वारा बरसात के पानी को इकट्ठा करने की शुरुआत करनी चाहिए। धरती के क्षेत्रफल का लगभग ७० प्रतिशत भाग जल से भरा हुआ है परंतु, पीने योग्य जल मात्र ३ प्रतिशत है। इसमें से भी मात्र १ प्रतिशत मीठे जल का ही वास्तव में हम उपयोग कर पाते हैं। पानी का इस्तेमाल करते हुए हम पानी की बचत के बारे में जरा भी नहीं सोचते, जिसके परिणामस्वरूप अधिकांश जगहों पर जल संकट की स्थिति पैदा हो चुकी है। इसी कारण राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश आदि प्रांतों में जल संरक्षण के लिए नाड़ी, तालाब, जोहड़, बन्धा, सागर, समंद एवं सरोवर आदि बनाने की प्राचीन परम्परा रही है। राजा-महाराजाओं तथा सेठ-साहूकारों ने अपने पूर्वजों की स्मृति में अपने नाम को चिरस्थायी बनाने के उद्देश्य से इन प्रदेशों के विभिन्न भागों में कलात्मक बावड़ियों, कुओं, तालाबों, झालरों एवं कुंडों का निर्माण करवाया। राजस्थान में जल प्रबन्धन विशेष रूप से देखने योग्य है और अनुकरणीय भी है। जल संचयन की परम्परा वहाँ के सामाजिक ढाँचे से जुड़ी हुई है तथा जल के प्रति धार्मिक दृष्टिकोण के कारण ही प्राकृतिक जलस्रोतों को पूजा जाता है।

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