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विजय सम्मान

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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महाविजय अभियान से,अश्वमेध का अश्व।
क्षत-विक्षत रिपुदल हुआ,कामदार तेजश्वll

अहंकार की आग में,हुआ विरोधी अन्त।
चोरों का अदभुत मिलन,हार गई उस सन्तll

गाली प्रधान को हर दिवस,कह गब्बर अपमान।
नोटबंदी का भय दिखा,सूट-बूट बदनामll

राष्ट्रवाद भारी पड़ा,मुद्दा बना विकास।
बालकोट का शौर्यबल,मोदी पर विश्वासll

रण भेदा कुरुक्षेत्र का,पार्थ कृष्ण के साथ।
राजनीति का गूढ़ पाठ,कूटनीति का हाथll

खतरे में जनतंत्र था,विपक्ष अरू साहित्य।
हुआ आज जनमत सबल,लोकतंत्र औचित्यll

लाँघी मर्यादा सभी,शर्मसार जनतंत्र।
अपना पथ भूली कलम,कर विरोध षडयंत्रll

कर विरोध हर मोड़ पर,पाये बिना सबूत।
गुंडा कह स्व सैन्यबल,चढ़ा पाक का भूतll

जनहित में सरकार के,हर निर्णय उपहास।
टुकड़े-टुकड़े गैंग का,साथ दिया बन खासll

झूठ-कपट अपवाह से,कर चुनाव बदरंग।
महाविजय दे सत्य को,महाशौर्य नवरंगll

महाजीत है देश की,गद्दारों की हार।
जनता है रणबाँकुरा,दी मोदी उपहारll

संविधान इस जीत से,रक्षित पा सम्मान।
जनमानस आहत हृदय,पूरण हो अरमानll

राष्ट्रवाद की चोट पर,पड़ा देश का वोट।
जाति-धर्म गठजोड़ को,दिया तोड़ मत चोटll

छद्म धर्मनिरपेक्षता,सत्तावश हो स्वार्थ।
सनातनी अपमान का,बदला ले परमार्थll

भारतमाता यह विजय,है जनता सम्मान।
वन्दे मातरम् अमरता,कर्मरथी अरमानll

बदनीयत की हार यह,रीति-प्रीति की जीत।
सही नीति अरु दिशा की,नव विकास नवनीतll

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में,नीति-अनीति का वार।
धर्मविजय फिर से वतन,हो अधर्म की हारll

जीती अब इन्सानियत,जीती है ईमान।
निर्णायक जनता बनी,आन-शान निज मानll

जितने सत्ता स्वार्थ में,लूट झूठ जो पंक।
उतने ही कमलें खिले,बढ़ बीजेपी अंकll

पतन नहीं इतना तलक,गाली दें दिन-रात।
हो सुलाभ रिपु संबलित,हो विजयी अरिघातll

कवि निकुंज मानस मुदित,देख विजय इस देश।
सबजन सुख सदभाव हो,शान्ति प्रगति संदेशll

वर्धापन शुभकामना,मुल्क विजय सम्मान।
जय भारत व जय प्रधान,विश्वविजय सम्मानll

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥