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विश्व-संस्था में भारत को नया मौका

डॉ.वेदप्रताप वैदिक
गुड़गांव (दिल्ली) 
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संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद ऐसी संस्था है, जो सबसे शक्तिशाली है। इसके ५ सदस्य स्थायी हैं-अमेरिका,ब्रिटेन,फ्रांस,रूस और चीन। इन पांचों सदस्यों को ‘वीटो’ का अधिकार है। अर्थात यदि इनमें से १ भी किसी प्रस्ताव का विरोध कर दे तो वह पारित नहीं हो सकता। इन ५ के अलावा १० साधारण सदस्य हैं,जो २ साल के लिए चुने जाते हैं। भारत कई बार इस परिषद का साधारण सदस्य रह चुका है,लेकिन यह पहली बार हुआ है कि भारत ने इस परिषद के अध्यक्ष के तौर पर १ अगस्त से अपना काम शुरु कर दिया है। वैसे तो संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टी.एस. तिरुमूर्ति ही प्रायः अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठेंगे,लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस अवसर को छूटने नहीं देंगे। यों तो प्रधानमंत्री नरसिंहराव भी परिषद की बैठक में १ बार शामिल हुए थे लेकिन शामिल होने और अध्यक्षता करने में बड़ा फर्क है। देखना है कि भारतीय अध्यक्षता का वह दिन ठीक से निभ जाए। अपनी अध्यक्षता के कार्यकाल में भारत क्या वही करेगा,जो दूसरे देश करते रहे हैं ? पता चलता है कि भारत ३ मुद्दों पर सबसे ज्यादा जोर देगा। एक तो सामुद्रिक सुरक्षा,दूसरा शांति-व्यवस्था और तीसरा आतंकवाद-विरोध! ये ३ मुद्दे महत्वपूर्ण और अच्छे हैं। हो सकता है कि,भारत की अध्यक्षता के दौरान १ साल के लिए अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना को भेजने का सुरक्षा परिषद फैसला कर ले और वहां चुनाव द्वारा लोकप्रिय सरकार कायम करवा दे तो भारत की अध्यक्षता ऐतिहासिक और चिर-स्मरणीय हो जाएगी। इसके अलावा भारत की अध्यक्षता में यदि दुनिया को परमाणुशस्त्रविहीन बनाने की कोशिश हो तो संपूर्ण मनुष्य जाति भारत की आभारी होगी। यह काम अत्यंत कठिन और लगभग असंभव है,लेकिन यदि भारत के पास कोई महात्मा गांधी जैसा प्रधानमंत्री होता तो शायद महाशक्तियां उसका आग्रह मान लेंती। फिर भी भारत को इस दिशा में अपना प्रयत्न जारी रखना चाहिए। परमाणु-विध्वंस जैसा खतरा उस सूक्ष्म विध्वंस से भी है,जो पर्यावरण के प्रदूषण से हो रहा है। सारी दुनिया में लाखों लोग रोज हताहत हो रहे हैं,लेकिन प्रदूषण पर कोई प्रभावी लगाम नहीं है। यदि परिषद सारी दुनिया में प्रदूषण-मुक्ति का कोई जन-आंदोलन छेड़ सके तो यह विश्व-संस्था विश्व-वंदनीय बन सकती है। भारत चाहे तो वह संयुक्त राष्ट्र संघ के पुनर्गठन की मांग भी रख सकता है कि ताकि भारत,ब्राजील,द. अफ्रीका,जर्मनी जैसे राष्ट्रों को विशेष महत्व मिले।

परिचय– डाॅ.वेदप्रताप वैदिक की गणना उन राष्ट्रीय अग्रदूतों में होती है,जिन्होंने हिंदी को मौलिक चिंतन की भाषा बनाया और भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत संघर्ष और त्याग किया। पत्रकारिता सहित राजनीतिक चिंतन, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और हिंदी के लिए अपूर्व संघर्ष आदि अनेक क्षेत्रों में एकसाथ मूर्धन्यता प्रदर्शित करने वाले डाॅ.वैदिक का जन्म ३० दिसम्बर १९४४ को इंदौर में हुआ। आप रुसी, फारसी, जर्मन और संस्कृत भाषा के जानकार हैं। अपनी पीएच.डी. के शोध कार्य के दौरान कई विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन और शोध किया। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त करके आप भारत के ऐसे पहले विद्वान हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोध-ग्रंथ हिन्दी में लिखा है। इस पर उनका निष्कासन हुआ तो डाॅ. राममनोहर लोहिया,मधु लिमये,आचार्य कृपालानी,इंदिरा गांधी,गुरू गोलवलकर,दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी सहित डाॅ. हरिवंशराय बच्चन जैसे कई नामी लोगों ने आपका डटकर समर्थन किया। सभी दलों के समर्थन से तब पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले। श्री वैदिक ने अपनी पहली जेल-यात्रा सिर्फ १३ वर्ष की आयु में हिंदी सत्याग्रही के तौर पर १९५७ में पटियाला जेल में की। कई भारतीय और विदेशी प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत मित्र और अनौपचारिक सलाहकार डॉ.वैदिक लगभग ८० देशों की कूटनीतिक और अकादमिक यात्राएं कर चुके हैं। बड़ी उपलब्धि यह भी है कि १९९९ में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आप पिछले ६० वर्ष में हजारों लेख लिख और भाषण दे चुके हैं। लगभग १० वर्ष तक समाचार समिति के संस्थापक-संपादक और उसके पहले अखबार के संपादक भी रहे हैं। फिलहाल दिल्ली तथा प्रदेशों और विदेशों के लगभग २०० समाचार पत्रों में भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर आपके लेख निरन्तर प्रकाशित होते हैं। आपको छात्र-काल में वक्तृत्व के अनेक अखिल भारतीय पुरस्कार मिले हैं तो भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में विशेष व्याख्यान दिए एवं अनेक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आपकी प्रमुख पुस्तकें- ‘अफगानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’, ‘अंग्रेजी हटाओ:क्यों और कैसे ?’, ‘हिन्दी पत्रकारिता-विविध आयाम’,‘भारतीय विदेश नीतिः नए दिशा संकेत’,‘एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका:इंडियाज आॅप्शन्स’,‘हिन्दी का संपूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो ?’ और ‘वर्तमान भारत’ आदि हैं। आप अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित हैं,जिसमें विश्व हिन्दी सम्मान (२००३),महात्मा गांधी सम्मान (२००८),दिनकर शिखर सम्मान,पुरुषोत्तम टंडन स्वर्ण पदक, गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार,हिन्दी अकादमी सम्मान सहित लोहिया सम्मान आदि हैं। गतिविधि के तहत डॉ.वैदिक अनेक न्यास, संस्थाओं और संगठनों में सक्रिय हैं तो भारतीय भाषा सम्मेलन एवं भारतीय विदेश नीति परिषद से भी जुड़े हुए हैं। पेशे से आपकी वृत्ति-सम्पादकीय निदेशक (भारतीय भाषाओं का महापोर्टल) तथा लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन की है। आपकी शिक्षा बी.ए.,एम.ए. (राजनीति शास्त्र),संस्कृत (सातवलेकर परीक्षा), रूसी और फारसी भाषा है। पिछले ३० वर्षों में अनेक भारतीय एवं विदेशी विश्वविद्यालयों में अन्तरराष्ट्रीय राजनीति एवं पत्रकारिता पर अध्यापन कार्यक्रम चलाते रहे हैं। भारत सरकार की अनेक सलाहकार समितियों के सदस्य,अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ और हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कृतसंकल्पित डॉ.वैदिक का निवास दिल्ली स्थित गुड़गांव में है।

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