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वो निकले बड़े चित्तचोर

डॉ. कुमारी कुन्दन
पटना(बिहार)
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कारी बदरिया घिर-घिर आये,
चमके बिजलिया,मचाये शोर।
मन मयूरा छम-छम नाचे,
जैसे वनमा नाचे मोर॥
वो निकले बड़े चित्तचोर,
मैं देखूं उन्हें चहुँओर।

तसव्वुर में वो मिलते तो होंगे,
कदम उनके भी बढ़ते तो होंगे
चले मंजिल की ओर, पर दिल,
पर चलता ना होगा कोई जोर।
वो निकले बड़े चित्तचोर,
मैं देखूँ उन्हें चहुँओर।

कोई उनको प्यार करे,
अपना दिल निसार करे।
मन ही मन कुछ सोंचकर और
होते तो होंगे,भाव-विभोर।
वो निकले बड़े चित्त चोर,
मैं देखूँ उन्हे चहुंओर।

वो दूर रहे, पर पास रहे,
दिल के भी वो खास रहे।
कोई लाख लगाये जोर,
पर ना टूटी लगन की डोर।
वो निकले बड़े चित्त चोर,
मैं देखूँ उन्हें चहुंओर॥

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