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शुभ्र मातु भारती…

डॉ.विद्यासागर कापड़ी ‘सागर’
पिथौरागढ़(उत्तराखण्ड)
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हाथ में ध्वजा लिये,शुभ्र मातु भारती।
भोर की नव रश्मियाँ,आरती उतारती॥
ये मंद सी बयार है,विहग गान गा रहे।
हरित विटप और लता,रूप हैं सजा रहे॥
सुरसुरी पग धो रही, नग राजे भाल में।
कर त्रिशूल है धरा,अब्ज लाल माल में॥
मन्दिरों की घंटियां,ऊँ नित उचारती।
भोर की नव रश्मियाँ,आरती उतारती॥
हाथ में ध्वजा लिये,शुभ्र मातु भारती।
भोर की नव रश्मियाँ,आरती उतारती॥
चुनर व्योम की सजी,चीर है नदीश का।
भारती का भाल है,वन्दनीय ईश का॥
फल लदी हैं डालियां,फूल में सुवास है।
मधु घुले से शब्द हैं,उरों में उछास है॥
माँ भारती का धरा,रूप नित सँवारती।
भोर की नव रश्मियाँ ,आरती उतारती॥
हाथ में ध्वजा लिये,शुभ्र मातु भारती।
भोर की नव रश्मियाँ,आरती उतारती॥
किसान खेत में सभी,स्वेद हैं बहा रहे।
पावनी नदों में नित,देवता नहा रहे॥
देश में घी और दधि,दूध की बहार है।
जीवन की कला यहाँ,गीता का सार है॥
देवजन की टोलियां,माँ इसे पुकारती।
भोर की नव रश्मियाँ ,आरती उतारती॥
हाथ में ध्वजा लिये,शुभ्र मातु भारती।
भोर की नव रश्मियाँ ,आरती उतारती॥
परिचय-डॉ.विद्यासागर कापड़ी का सहित्यिक उपमान-सागर है। जन्म तारीख २४ अप्रैल १९६६ और जन्म स्थान-ग्राम सतगढ़ है। वर्तमान और स्थाई पता-जिला पिथौरागढ़ है। हिन्दी और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले उत्तराखण्ड राज्य के वासी डॉ.कापड़ी की शिक्षा-स्नातक(पशु चिकित्सा विज्ञान)और कार्य क्षेत्र-पिथौरागढ़ (मुख्य पशु चिकित्साधिकारी)है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत पर्वतीय क्षेत्र से पलायन करते युवाओं को पशुपालन से जोड़ना और उत्तरांचल का उत्थान करना,पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं के समाधान तलाशना तथा वृक्षारोपण की ओर जागरूक करना है। आपकी लेखन विधा-गीत,दोहे है। काव्य संग्रह ‘शिलादूत‘ का विमोचन हो चुका है। सागर की लेखनी का उद्देश्य-मन के भाव से स्वयं लेखनी को स्फूर्त कर शब्द उकेरना है। आपके पसंदीदा हिन्दी लेखक-सुमित्रानन्दन पंत एवं महादेवी वर्मा तो प्रेरणा पुंज-जन्मदाता माँ श्रीमती भागीरथी देवी हैं। आपकी विशेषज्ञता-गीत एवं दोहा लेखन है।