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सशक्त विपक्ष बिन लोकतंत्र अधूरा

ललित गर्ग
दिल्ली

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भारतीय लोकतंत्र के सम्मुख एक ज्वलंत प्रश्न उभर के सामने आया है कि क्या भारतीय राजनीति विपक्ष विहीन हो गई है ? आज विपक्ष इतना कमजोर नजर आ रहा है कि सशक्त या ठोस राजनीतिक विकल्प की संभावनाएं समाप्त प्रायः लग रही हैं। इतना ही नहीं, विपक्ष राजनीति ही नहीं, नीति विहीन भी हो गया है ? यही कारण है कि आजादी का अमृत महोत्सव के अवसर तक पहुंचते हुए राजनीतिक सफर में विपक्ष की इतनी निस्तेज, बदतर एवं विलोपपूर्ण स्थिति कभी नहीं रही। इस तरह का माहौल लोकतंत्र के लिए एक चुनौती एवं विडम्बना है। भले ही पूर्व दशकों में कांग्रेस भारी बहुमत में आया करती थी, परन्तु छोटी-छोटी संख्या में आने वाले राजनीतिक दल लगातार सरकार को अपने तर्कों एवं जागरूकता से दबाव में रखते थे, अपनी जीवंत एवं प्रभावी भूमिका से सत्ता पर दबाव बनाते थे। यही लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण था, लेकिन अब ऐसी स्थिति समाप्त होती जा रही है बल्कि इस कदर बदतर हो चुकी है कि चुनावों से पहले ही स्पष्टता एवं दृढ़ता के साथ भविष्यवाणी की जा सकती है कि सत्ता में फिर से भाजपा ही आएगी। यह स्थिति अचानक तो नहीं आई है ?
विपक्ष की इस कमजोर स्थिति का दोष विपक्षी दल सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी पर लगाते आ रहे हैं मगर इसके लिए स्वयं उनसे बढ़ कर कोई और दोषी नहीं है। बड़ा कारण सभी विपक्षी दलों का पारिवारिक दलों में तब्दील हो जाना भी है। १४० करोड़ की आबादी वाले देश में विपक्ष के पास ‘मोदी’ विरोध के अलावा कोई प्रखर मुद्दा नहीं है, इससे बढ़कर नकारापन क्या होगा ? इसकी वजह यही नजर आती है कि समूचे विपक्ष के पास आज प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के कद के आसपास का भी कोई नेता नहीं है। लोकतन्त्र में हालांकि यह कहा जाता है कि व्यक्तियों से बढ़ कर संस्था या राजनीतिक दल का महत्व होता है, परन्तु आजादी के बाद लगभग ६० साल तक राज करने वाली पार्टी कांग्रेस ने ही इसे जड़ से समाप्त करने का प्रयास किया और स्वतन्त्रता आन्दोलन की विरासत के नाम पर एक ही परिवार के नाम सत्ता की चाबी रखने का ठेका छोड़ दिया। यदि भाजपा जैसा राष्ट्रवादी दल एवं नरेन्द्र मोदी जैसा कद्दावर नेता नहीं उभरता तो जो स्थिति राजपक्षे परिवार ने श्रीलंका की है, वही स्थिति गांधी परिवार भारत की कर देता, मगर जब विपक्षी नेताओं ने ठान लिया है कि वे श्री मोदी के शब्दों, योजनाओं एवं नीतियों की बाल की खाल निकालेंगे तो सिर्फ उनकी बुद्धि पर तरस खाया जा सकता है।
आज देश में विपक्ष के पास खासकर कांग्रेस या किसी भी दल के पास कोई प्रभावी नेतृत्व नहीं है, जो देश की ज्वलंत समस्याओं के समाधान के लिए अपनी स्वतंत्र सोच को उभार सकें। भाजपा और संघ परिवार पर वार करने लिए कोई धारधार हथियार भी इनके पास नहीं है।
आज विपक्ष अस्तित्वविहीन होता जा रहा है। सशक्त विपक्ष के साथ प्रभावी, सक्षम, समर्थ एवं सर्वस्वीकार्य विपक्षी नेता भी लोकतंत्र की मूल आवश्यकता है। जैसा कि आजादी के बाद ताकतवर कांग्रेस दल के शासन में विपक्ष बहुत तेजस्वी एवं प्रभावी रहा है। वही विपक्ष अपनी साफ, पारदर्शी, नैतिक एवं राष्ट्रवादी राजनीतिक मूल्यों के बल पर आज स्पष्ट बहुमत से शासन कर रहा है। आजादी दिलाने वाली कांग्रेस को चुनौती देना जटिल था, परन्तु उस दौर में कांग्रेस के खिलाफ खड़े हुए अधिसंख्य राजनीतिक दलों की कमान भी आजादी के नायकों के पास ही थी। अतः संसद में कम संख्या में रहने के बावजूद एक से बढ़ कर एक नेता विपक्षी दलों के पास थे। इनमें प्रमुख हैं-आचार्य कृपलानी, डॉ. राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेन्द्र देव, तथा जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और वीर सावरकर। उस दौर में विपक्ष ने अपनी सार्थक भूमिका से लोकतंत्र को मजबूती दी, लेकिन आज विपक्ष अपनी सार्थक भूमिका निर्वाह करने में असफल हो रहे हैं क्योंकि दलों के दलदल वाले देश में दर्जनभर से भी ज्यादा विपक्षी दलों के पास कोई ठोस एवं बुनियादी मुद्दा नहीं रहा है। उनके बीच आपस में ही स्वीकार्य नेतृत्व का अभाव है, जो विपक्षी नेतृत्व की विसंगतियों को ही उजागर करता है। ऐसा लग रहा कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में अब नेतृत्व की नैतिकता एवं नीतियों को प्रमुख मुद्दा न बनाने के कारण विपक्ष नकारा साबित हो रहा है, अपनी पात्रता को खो रहा है।
विपक्ष गंभीर नहीं हैैं, वे अवसरवादी राजनीति की आधारशिला रखने के साथ ही जनादेश की मनमानी व्याख्या करने, मतदाता को गुमराह करने की तैयारी में ही लगे हैं। इन्हीं स्थितियों से विपक्ष की भूमिका पर सन्देह एवं शंकाओं के बादल मंडराने लगे हैं।
क्या देश के अंदर विपक्ष को खत्म करने की साजिश हो रही है ? भाजपा पर लग रहे ये आरोप निराधार एवं भ्रामक हैं। यह कहना बिल्कुल भी उचित नहीं है कि भारत की राजनीति विपक्ष विहीन हो चुकी है, मनोबल अवश्य टूटा है, अतीत के दाग पीछा कर रहे हैं लेकिन विपक्ष विहीन भारतीय राजनीति की स्थिति जब भी बनेगी, संभवतः लोकतंत्र भी समाप्त हो जाएगा।
विपक्ष अपनी इस दुर्दशा के लिए खुद जिम्मेदार है। विपक्ष वैचारिक, राजनीतिक और नीतिगत आधार पर सत्तारूढ़ दल का विकल्प प्रस्तुत करने में नाकाम रहा है। उसने सत्तारूढ़ भाजपा की आलोचना की, पर कोई प्रभावी विकल्प नहीं दिया। किसी और को दोष देने के बजाय उसे अपने अंदर झांककर देखना चाहिए।
विपक्ष ने मजबूती से अपनी सार्थक एवं प्रभावी भूमिका का निर्वाह नहीं किया तो उसके सामने आगे अंधेरा ही अंधेरा है।