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साँच को कभी भी आँच नहीं

गोवर्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’
बीकानेर(राजस्थान)
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हम सभी को हमेशा सत्य ही बोलना चाहिए, क्योंकि सत्य वचन का वजन स्वतः ही बढ़ जाता है। आपको अपने वचन को सिद्ध करने के लिए किसी भी प्रकार की कसम खाने की आवश्यकता ही नहीं। याद रखें सत्य बोलने वाले की कभी भी हार नहीं होती। हाँ, कुछ समय के लिए परेशानी हो सकती है, लेकिन लाख मुसीबत आने पर भी सच्चा आदमी घबराता नहीं है बल्कि डटा रहता है और अन्त में उन मुसीबतों से छूटकारा मिलना तय है, क्योंकि साँच को कभी भी आँच नहीं। अर्थात सत्य कभी पराजित नहीं होता से सम्बन्धित एक ऐतिहासिक घटना-
भारतीय भाषायी प्रेस के प्रवर्तक, जनजागरण और सामाजिक सुधार आन्दोलन के प्रणेता राजा राममोहन राय के जीवन से सम्बन्धित यह सच्ची घटना जो अनेक मायनों में प्रेरणादायक तो है ही, साथ ही सच बोलने से आपकी जीत हर हाल में होगी ही, इस तथ्य की भी पुष्टि करती है।
हुआ यूँ कि १८०८-१८०९ के बीच राममोहन राय की जब भागलपुर में तैनाती थी, तब वे एक बार पालकी में सवार होकर गंगाघाट से भागलपुर शहर की ओर जा रहे थे, तो घोड़े पर सैर के लिए निकले कलेक्टर सामने आ गए। पालकी में लगे परदे के कारण राममोहन राय उनको देख नहीं सके और यथोचित शिष्टाचार से चूक गए। यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि उन दिनों किसी भी भारतीय को किसी अंग्रेज अधिकारी के आगे घोड़े या वाहन पर सवार होकर गुजरने की इजाजत नहीं थी। इस ‘गुस्ताखी’ पर कलेक्टर आग बबूला हो उठे। राममोहन राय ने उन्हें सच्ची बात बता दी। अर्थात अपनी तरफ से उन्हें यथासंभव सफाई दी, लेकिन वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हुए। तब राममोहन राय उस समय वहाँ से पालकी में बैठ निकल लिए, लेकिन उसके बाद १२ अप्रैल १८०९ को उन्होंने गवर्नर जनरल लार्ड मिंटो को उस पूरे घटनाक्रम को विस्तार से लिख भेजा, जिसके परिणाम स्वरूप गवर्नर ने उस कलेक्टर से उस घटना का पूरा विवरण मंगाया। कलेक्टर ने अपनी रिपोर्ट में राममोहन राय की शिकायत को झूठी बताया, लेकिन जैसा कि सत्य वचन का वजन स्वतः ही बढ़ जाता है, उसी तथ्यानुसार राममोहन जी की लिखावट का असर यह हुआ कि गवर्नर जनरल ने स्वतः अलग से जांच कराई और शिकायत को सही पाया। इसलिए गवर्नर जनरल ने अपने न्यायिक सचिव की मार्फत कलेक्टर को फटकार तो लगाई ही, साथ ही आगाह भी कर दिया कि वे भविष्य में देशी लोगों से बेवजह के वाद-विवाद में न फंसें। इस तरह राममोहन जी सत्य वचन के चलते मुसीबत से बचे ही नहीं, बल्कि भविष्य में अन्य भारतीयों को परेशानी न हो उस प्रकार का एक रक्षा कवच प्रदान कर दिया।
सुप्रसिद्ध कवि शिरोमणि कबीरदास जी ने सत्य की शक्ति का वर्णन करते हुए जो दोहा गढ़ा-
साँच शाप न लागे, साँच काल न खाय। साँचहि साँचा जो चले, ताको कहत न शाय॥ उपरोक्त दोहे से कबीरदास जी ने सभी को बता दिया कि सत्य अथाह शक्ति है, यही यथार्थ है। सच बोलने वाले को तीनों लोकों का भी भय नहीं होता, क्योंकि सत्यवादी से तो स्वयं यमराज भी डरते हैं। सत्य को दबा पाने अथवा छुपा पाने की क्षमता संसार में किसी भी वस्तु में नहीं है। कहा है कि सांच, अर्थात सत्य बोलने वाले को कोई श्राप नहीं लगता, किसी की बद्दुआ का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, साथ ही सत्य को न ही काल खा सकता है, न ही यह कभी मरता हैl अर्थात सत्य अमर एवं अजेय है। जो भी सत्य के सांचे में ढल जाता है, अर्थात जो मन-कर्म एवं वचन से सत्य का साथ देता है, उसका भला कौन नाश कर सकता है ?