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सोचो ज़रा..

सारिका त्रिपाठी
लखनऊ(उत्तरप्रदेश)
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विश्व धरा दिवस स्पर्धा विशेष………


सोचो ज़रा…
अगर हम पेड़ होते,
जग को ठंडी छांह देते
फल,पत्ते,लकड़ी भी,
कितने उपयोगी होते…l

नन्हीं चिरैया अगर होते,
मीठी बोली से जग मोह लेते
फूल होते तो रंगों से अपने,
सजाते कितने मन आँगन
खुशबूओं से भर देते जीवनl

सोचो अगर…होते पवन
जन-जन को जीवन देते,
शीतलता जग में भर देते
अगर होते नदी ताल-तलैय्या,
निर्मल जल कल-कल कर
हर कंठ भिगोते…खुश होतेl

सोचो अगर…होते बादल,
बरस जाते तपती धरा पर,
कण-कण को भिगोते…
फसलों की हरी-भरी दुनिया से,
हर पेट में दाना पहुंचातेl

अगर होते अग्नि से…
भोजन पका कर
क्षुधा बुझाते…
अगर होते धरती से,
माँ बन जाते
गोद में लिए जीवों को,
जीवन का गीत सुनातेl

सोचो अगर…होते हम,
गाय भैंस-बकरी से
दूध सबके लिए दे पाते,
सोचो ना अगर
हम तितली,मोर,मछली,
कुछ भी होते
जग को सुंदर ही तो बनाते,
पर…
ये जो पाया मानव जीवन,
व्यर्थ गंवा रहे हैं
हिंसा द्वेष ईर्ष्या संग,
लहू लोगों का बहा रहे हैं…??
जिस जीवन से,
कर न सकें अगर
भला किसी का…,
सोचो क्यों कर जिए जा रहे हैं ??
पृथ्वी का भार केवल
बढ़ा रहे हैं…l

सोचो इस जीवन में
क्या अच्छा कर पा रहे हैं,
सोचो ज़रा…ll

परिचय-सारिका त्रिपाठी का निवास उत्तर प्रदेश राज्य के नवाबी शहर लखनऊ में है। यही स्थाई निवास है। इनकी शिक्षा रसायन शास्त्र में स्नातक है। जन्मतिथि १९ नवम्बर और जन्म स्थान-धनबाद है। आपका कार्यक्षेत्र- रेडियो जॉकी का है। यह पटकथा लिखती हैं तो रेडियो जॉकी का दायित्व भी निभा रही हैं। सामाजिक गतिविधि के तहत आप झुग्गी बस्ती में बच्चों को पढ़ाती हैं। आपके लेखों का प्रकाशन अखबार में हुआ है। लेखनी का उद्देश्य- हिन्दी भाषा अच्छी लगना और भावनाओं को शब्दों का रूप देना अच्छा लगता है। कलम से सामाजिक बदलाव लाना भी आपकी कोशिश है। भाषा ज्ञान में हिन्दी,अंग्रेजी, बंगला और भोजपुरी है। सारिका जी की रुचि-संगीत एवं रचनाएँ लिखना है।