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स्वाधीन चेतना से होता है विवेक का निर्माण

वाराणसी (उप्र)।

लालच और दमन अभिव्यक्ति के लिये सबसे बड़े खतरे हैं। साहित्य की महानता की ज़मीन इससे तय होती है कि उसके विवेक का निर्माण स्वाधीन चेतना से हुआ है या नहीं।
यह वक्तव्य प्रो. सुरेन्द्र प्रताप ने हिन्दी विभाग के शोध संवाद समूह की भित्ति पत्रिका ‘थाती’ का लोकार्पण करतें हुए व्यक्त किए। विभाग के गलियारे में दूसरे अंक के लोकार्पण के अवसर पर विभागाध्यक्ष प्रो. निरंजन सहाय ने कहा कि, प्रेमचन्द और गांधी की विरासत का सबसे अहम पहलू है अभिव्यक्ति की आज़ादी। पत्रिका का यह अंक अभिव्यक्ति की स्वाधीनता और साहित्य बोध पर केंद्रित है। नई शिक्षा नीति भारतीय भाषाओं में संवाद की वकालत करती है और अगला अंक हिन्दी के हजारी प्रसाद द्विवेदी, कन्नड़ के गिरीश कर्नाड व मराठी के विजय तेंदुलकर के अवदानों पर केंद्रित होगा।
समारोह के वक्ता मोहम्मद जाहिद (एसोसिएट प्राध्यापक-हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय) ने कहा कि विभाग का यह प्रयास, साहित्यबोध, राष्ट्रबोध और लोकतांत्रिक चेतना के लिए उल्लेखनीय है। कवयित्री प्रो. वंदना मिश्रा ने रचनाओं के साक्ष्य पर इसे उल्लेखनीय प्रयास बताया। सम्पादक और

एसो. प्राध्यापक डॉ. अविनाश कुमार सिंह एवं सम्पादक प्रज्ञा पांडेय ने भी अपने भाव प्रकट किए। संचालन आरती तिवारी ने किया। धन्यवाद ज्ञापन अंजना भारतीय ने दिया।

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