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हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के अभियान के सेनानी ‘माधव राव सप्रे’

राजेश बादल
दिल्ली
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आज़ादी से पहले हिंदी और हिंदी पत्रकारिता के विकास में ग़ैर हिंदीभाषियों का योगदान अदभुत और अविस्मरणीय है। इनमें महात्मा गाँधी, कन्हैया लाल मानक लाल मुंशी, सी. राजगोपालाचारी, प्रेमचंद और सरदार भगत सिंह जैसे कई नाम हैं, लेकिन माधवराव सप्रे का नाम इन सबसे ऊपर है। उस ग़ुलाम हिन्दुस्तान में उन्होंने कलम और विचारों से लोगों को जगाने का जो काम किया, दुनिया के इतिहास में उसकी कोई मिसाल नहीं है। दरअसल, माधव राव सप्रे भारतीय स्वाधीनता संग्राम के क्षितिज पर महात्मा गांधी के उदय से पहले बहुत बड़ा नाम था। आज हम सब स्वराज की सोच को महात्मा गाँधी से जोड़कर देखते हैं, लेकिन सप्रे जी ने गाँधी जी से भी कई बरस पहले भारत के लोगों को स्वराज का नारा दिया था। उसके मायने समझाए थे और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के अभियान का नेतृत्व किया था। उन्होंने १३ अप्रैल १९०७ से लोकमान्य तिलक के लोकप्रिय मराठी ‘केसरी’ का हिंदी में ‘हिंदी केसरी’ नाम से प्रकाशन किया। इसका उद्देश्य भी सार्वजनिक किया गया था-राजनीतिक ग़ुलामी दूर करके पूर्ण स्वराज प्राप्त करना। उस ज़माने में स्वराज की बात करने वाले संभवत: सप्रे जी ही थे। केसरी में स्वतंत्रता सेनानियों का खुला समर्थन होता था। स्वराज हासिल करने के तरीक़ों पर वैचारिक आलेख छपते थे। स्वदेशी का प्रचार और विदेशी का बहिष्कार करने के लिए प्रेरित करने वाला साहित्य छपता था। गोरी सरकार उसके तेवर बर्दाश्त नहीं कर पाई। आख़िरकार सप्रे जी और उनके सहयोगी सम्पादक श्री कोल्हटकर को गिरफ़्तार कर लिया गया। उन पर राजद्रोह का मुक़दमा चलाया गया। वे जेल में डाल दिए गए पर, ‘हिंदी केसरी’ उनका पहला शाहकार नहीं था। ‘हिंदी केसरी’ से सालभर पहले उन्होंने नागपुर से मई में हिंदी ग्रन्थमाला का प्रकाशन शुरू किया था। इसके लिए हिंदी ग्रन्थ प्रकाशन मण्डली का गठन किया गया था। उसमें भारत को आज़ाद कराने वाले ओजस्वी लेख प्रकाशित किए जाते थे। इस कड़ी में सप्रे जी के एक आलेख ‘स्वदेशी आंदोलन और बायकॉट’ ने तो अवाम को झकझोर दिया था। जिस अंक में यह लेख छपा था, उस पर बंदिश लगा दी गई थी। ऐसे ही तेज़-तर्राट लेखों ने गोरी हुकूमत को हिला दिया था। अँगरेज़ सरकार ने डाकख़ाने से उन ग्राहकों के डाक के पते हासिल किए, जिन्हें ग्रंथमाला के अंक भेजे जाते थे। फिर उन्हें मजबूर किया गया कि, वे सप्रे सम्पादित ग्रंथमाला को मँगाना बंद कर दें। यही नहीं, सरकारी कर्मचारियों से कहा जाता था कि वे इन अंकों को पढ़ना बंद कर दें। यदि उनके पास ये अंक पाए जाते तो उन्हें नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया जाता। इसके बाद पुलिस उनके ख़िलाफ़ मामला दर्ज़ करती और ३ साल के लिए वे जेल में डाल दिेए जाते। हिंदी ग्रंथमाला से पहले उन्होंने छत्तीसगढ़ के पेंड्रा रोड से सन १९०० (जनवरी) में ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन प्रारंभ किया था। यह एक वैचारिक पत्रिका थी। कहा जा सकता है कि हिंदी में समालोचना का प्रारंभ छत्तीसगढ़ मित्र ने ही किया। हिंदी के अनेक जानेमाने लेखक इस पत्रिका में लिखते थे।
मेरी नज़र में सप्रे जी के साहित्य और पत्रकारिता क्षेत्र के २ महत्वपूर्ण योगदान बहुत बड़े हैं। उस दौर की हिंदी प्रगतिशील और आधुनिक दृष्टिकोण के साथ बड़े संकोच से जुड़ी थी। वह संस्कृतनिष्ठ थी, एक तय ढर्रे पर चल रही थी। यह दिलचस्प विरोधाभास है कि, हम प्राचीन भारत में चिकित्सा, गणित, अभियांत्रिकी, खगोलशास्त्र, अर्थशास्त्र और शल्य चिकित्सा जैसे वैज्ञानिक विषयों के बारे में लेखन पर गर्व तो करते रहे हैं, लेकिन हिंदी में अपने उस ज्ञान को प्रस्तुत करने के बारे में नहीं सोचा गया। आज भी हम इसे अपनाने में झिझकते हैं। सप्रे जी ने ११९ साल पहले इसे भाँप लिया था और वे अपने भाषणों तथा लेखों में हिंदी को वैज्ञानिक विषयों से भर देने पर ज़ोर दिया करते थे। जब काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने उनकी इस चिंता को महसूस किया तो हिंदी में विज्ञानकोश बनाने का निर्णय लिया गया। सप्रे जी से अनुरोध किया गया कि वे अर्थशास्त्र की आधुनिक शब्दावली को आकार दें। सप्रे जी ने १९०४ में यह शब्दावली तैयार कर दी। इस शब्दावली में अँगरेज़ी के १३२० शब्दों के लिए हिंदी के २११५ नए शब्द गढ़े गए थे। २ साल बाद यह वैज्ञानिक शब्दकोश छप कर सामने आया। हिंदी भाषा इसके बाद बेहद अमीर हो गई। सप्रे जी ने आधुनिक अर्थशास्त्र पर एक किताब भी लिखी थी। जब पंडित महावीर प्रसाद द्विवेद्वी ने ‘संपत्तिशास्त्र’ नामक ग्रन्थ की रचना की तो उसमें सप्रे जी की इस किताब से बहुत सामग्री ली गई थी। कई साल बाद डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने अर्थशास्त्र पर अपना शोध ग्रन्थ दुनिया को सौंपा तो उसके मूल में वही चिंतन धारा थी जो माधवराव सप्रे लिख चुके थे। उस ज़माने में गोरी हुक़ूमत की आर्थिक नीतियाँ और उनसे हिंदुस्तान की बर्बादी इन दोनों ही महान पुरुषों के लेखन का मूल तत्व था।
साहित्य के क्षेत्र में माधवराव सप्रे का काम बेजोड़ है। उन्होंने ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में ६ कहानियाँ लिखीं। बाद में इन कहानियों को देवी प्रसाद वर्मा ने एक संकलन के रूप में प्रकाशित किया। इनमें ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ को हिंदी की पहली मौलिक कहानी माना गया। भले ही इन कहानियों पर संस्कृत की कथा परंपरा का प्रभाव हो पर, उनकी कथा वस्तु में समकालीन प्रसंग हैं और इस कारण वे आधुनिक रूप लेती हैं। कहानी विधा के विकास में सप्रे जी का यह योगदान अनूठा है। बाद में प्रेमचंद ने इस शैली को अपनी उर्दू-फ़ारसी दां हिंदी में उपयोग किया। उनका ‘सोजे वतन’ इसका उत्तम नमूना है, जिस पर अँगरेज़ सरकार ने रोक लगा दी थी। इसके अलावा कविताओं का अनुवाद और उनकी समीक्षा को नए अंदाज़ में प्रस्तुत करने की शुरुआत सप्रे जी ने ही की थी।
बताने की ज़रूरत नहीं कि एक भारतीय आत्मा के नाम से विख्यात दादा माखनलाल चतुर्वेदी, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र और संविधान सभा के सदस्य रहे महान हिंदीसेवी सेठ गोविन्द दास के लेखन और पत्रकारिता को सप्रे जी ने ही तराशा था। पिछले साल इन्हीं विलक्षण माधवराव सप्रे के जन्म का डेढ़ सौ वां साल था। उनकी याद में अनेक कार्यक्रम हुए और पत्रकारिता में उनके योगदान पर चर्चाएँ हुईं थीं। भोपाल में उनके नाम पर संचालित माधवराव सप्रे स्मृति समाचार-पत्र शोध संस्थान विश्व का अनूठा संस्थान है। सप्रे जी की परंपरा के प्रतिनिधि पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर पूर्वजों को याद करने का जो अनुष्ठान कर रहे हैं, उसका कोई जोड़ नहीं है। सप्रे संग्रहालय में हम सप्रे जी को धड़कते हुए पाते हैं और उनके होने का अहसास हमें होता है।

(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई)

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