पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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८०वर्षीय सुशीला जी जब से लकवाग्रस्त हुई हैं, चारपाई से लग गई हैं। एक सेविका सुबह-शाम आकर उनकी दैनिक क्रियाएं करवाने के बाद नाश्ता, फिर खाना और दवाई देकर चली जाती है। उनकी जुबान पर भी लकवे का असर हुआ है, इसलिए उनके मुँह से स्पष्ट शब्द नहीं निकल पाते।
आज सेविका नहीं आई थी। किसी कारण से उसने अवकाश लिया था।घर की रसोई से पकवान बनने की सोंधी खुशबू से पूरा घर महक रहा था। उनको समझ में आ रहा था, कि शायद आज उनके पति का श्राद्ध है, क्योंकि बेटा समाज में अपनी इज्जत बढ़ाने के लिए हर वर्ष भव्य आयोजन करता था।
उन्हें अपना समय याद आ रहा था, जब वह पंडितों के लिए खीर-पूड़ी और दही बड़ा आदि बनाया करतीं थीं। उनके पति रामनाथ कहा करते थे, कि “तुम तो पूरी अन्नपूर्णा हो, कितने लोगों को प्रेम से स्वादिष्ट भोजन करवा कर वस्त्र और दक्षिणा के साथ फल मिठाई भी दिया करती थी।”, लेकिन वाह रे भाग्य, आज सब व्यस्त हैं, पूड़ी की महक से पेट भरना पड़ रहा है। पूजा-पाठ, पिंडदान आदि की आवाजें आ रहीं थीं। शायद पंडितों के भोजन के बाद उनके लिए कोई खाना लेकर आएगा, लेकिन नहीं; आज सब लोग व्यस्तता में उनके भोजन की बात भूल गये हैं, क्योंकि रोज तो उनको भोजन सेविका दिया करती थी। उनके अपने बेटे, बहू और सभी लोग मेहमानों की आवभगत की व्यस्तता के कारण उनकी ओर से सबका ध्यान हट गया था।
भूख से व्याकुल अम्मा के प्राण कंठ तक आ गये थे। हर आहट से उनके मुँह में स्वादिष्ट खाने की याद करके पानी आ जाता, लेकिन किसी ने भी उनके कमरे की ओर नहीं झांका था।
आखिर में उनकी आँखें बरस पड़ी और वह सोचने लगीं कि यह कैसा श्राद्ध है, जब जीवित व्यक्ति की तो कोई सुध नहीं ले रहा है, लेकिन मरे हुए व्यक्ति को खुश करने के लिए इतना भव्य आयोजन करके कौव्वा और कुत्ते को भी खीर-पूड़ी से आव-भगत करके प्रेम से खिला रहे हैं।