ममता सिंह ‘विशिष्ट’
धनबाद (झारखंड)
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मैंने अक्सर लोगों को कहते सुना है- बाल रंगने से कोई जवान नहीं हो जाता। बुढ़ापे में इतना फैशन, क्या बात है। दूसरों को शर्मिन्दा करते हैं,
न खुद चैन से जीते हैं और न दूसरों को चैन से जीने देते हैं। आखिर क्यों हम दूसरों की ज़िंदगी में ताक-झांक करते हैं ?
बुढ़ापे में क्या उन्हें चैन से जीने का हक नहीं है ? बुढ़ापा आ गया तो क्या समय से पहले ही ऊपर चले जाएँ ? जो इंसान बचपन से शानो-शौकत से जीता चला आया है, तो क्या अचानक से वो गेरूआ वस्त्र धारण कर ले…? अचानक से जंगल चला जाए तपस्या करने के लिए..? लोगों से बात करना बंद कर दे, क्योंकि बुढ़ापा आ गया है।
ऐसा करके कुछ हो ना हो, पर दूसरों की ज़िंदगी कम जरूर कर देते हैं।
वे आइना देखकर ज़रूर खुद को बेबस महसूस करते होंगे। उन्हें खुद पर गुस्सा जरूर आता होगा, दूसरे लोगों के ताने से जरूर आहत होते होंगे। क्यों नहीं लोग उन्हें उनके हाल पर छोड़ देते, मरे को और क्या मारना…? उन्हें जैसा महसूस होगा, खुद ही अपने-आपको बदल लेंगे।
अक्सर ऐसा होता है, कि कुछ लोग साधारण ढंग से रहते हैं। उन्हें यही बात परेशान करती है और दूसरों को देख कर ईर्ष्या महसूस करते हैं, तो बहाने से उन्हें परेशान करते हैं। बुढ़ापा आ गया तो लोग उन्हें इज्जत देना बंद कर देते हैं,-
ऐ बुढ़िया, ऐ बूढ़े, बुड्ढा सठिया गया है,… आदि से उन्हें सम्बोधित करते हैं। अगर सही बात भी कर रहा, तो “भाषण दे रहा है” कहकर उसे जलील करते हैं।
आप दूसरे लोगों को मानसिक प्रताड़ना तभी दे सकते हैं, जब आप कभी बूढ़े ना हो। आप कभी बीमार न हो, लेकिन ऐसा संभव ही नहीं है, क्योंकि जिसने जन्म लिया है; समय आने पर बचपन, जवानी और बुढ़ापे के बाद मृत्यु को भी प्राप्त करेगा ही।इसलिए हमें ये हक बिल्कुल नहीं बनता, कि दूसरों को परेशान करें।