कुल पृष्ठ दर्शन :

कहाँ खो गया पनघट

दीप्ति खरे
मंडला (मध्यप्रदेश)
*************************************

सूखते कुएं की कहानी है ये,
वीरान पनघट की कहानी है ये
कभी आबाद थे जो,
उन सूने घाट की कहानी है ये।

एक समय पनघट पर जब,
पनिहारिन का लगता मेला था
खनकती चूड़ी, छम-छम पायल,
संगीत सुहाना सजता था।

प्रेम कहानी, घर के झगड़े,
पनघट ही पंचायत थी।
सखियों के संग चुहल-ठिठौली,
पनघट पर ही होती थी।

पंछी, पथिक, पाहुने हों या,
विचरण करती गऊएं, ग्वाल
पनघट पर उनकी प्यास बुझाकर,
दुआएं पनिहारिन लेती थी।

भरी गगरिया पनघट से जब,
पनिहारिन लेकर चलती थी
छलकते जल से अनजाने ही,
राहें शीतल करती थी।

फिर प्रगति की होड़ लगी,
पनघट पीछे छूट गया।
रीते ताल-तलैया सूखी,
फिर कुएं की बारी थी।

गाँव की शान कभी थे पनघट,
धीरे धीरे वीरान हुए
पनघट, पनिहारिन, कुएं, बावड़ी,
बस किस्सों में कैद हुए।

अब भी सूनी राहें पूछें,
कहाँ खो गया वो पनघट।
प्यासा मन जिसको ढूँढे,
उस पनघट की कहानी है ये॥