हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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तलाश जो ‘खत्म’ नहीं होती है जीवन में,
हर एक लम्हा उसका ‘गवाह’ होता है
फुर्सत कहाँ मिलती है ‘जमाने’ में आज-कल,
दो पल ‘सुकून’ के हवा हो रहे हैं…।
ठहराव के लिए ‘समय’ निकलना तो चाहता हूँ मैं,
पर ‘रोजमर्रा’ की दिनचर्या से पस्त हो गया हूँ मैं
नया जमाना नये ‘रंग’, फिर भी अकेला ही हूँ मैं,
दो पल ‘सुकून’ के हवा हो रहे हैं…।
चलना, रुकना, रुक के फिर ‘आगे’ बढ़ना जीवन है,
वक़्त के साथ चलते-चलते में उससे ‘ख़फ़ा’ हो गया हूँ
सिर्फ अपने-आपमें सिमट-सा गया हूँ मैं,
क्योंकि दो पल ‘सुकून’ के हवा हो रहे हैं…।
फिर वह दौर ‘कब’ आएगा, फुर्सत में बैठूंगा,
बातें और बातें होंगी, जिसमें ‘समय’ का कोई बंधन नहीं होगा।
हम और हमारा ‘परिवार’ फिर से मुस्कराएगा,
दो पल ‘सुकून’ के फिर हवा नहीं होंगे, यही विश्वास है मेरा…॥