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युद्ध का उन्माद

सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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क्यों युद्ध का उन्माद ये
प्रतिदिन ही बढ़ता जा रहा,
क्यों हो रहा मानव पशु-
संहार करता जा रहा।

क्यों चाहता वर्चस्व अपना
बस मैं ही मेरा हो रहा,
मानव गुणों को भूल कर-
सब ध्यान अपना कर रहा।

क्यों दूसरों को आगे बढ़ते
देख सकता वह नहीं,
निर्बलों की जान जाती-
क्यों शांति उसको प्रिय नहीं ?

क्या है उसे मालूम इतने
जो बम धमाके कर रहा,
पर्यावरण का हाल क्या-
कभी ध्यान इस पर कर रहा।

खुद जिएँ और जीने दें,
यह याद रखना चाहिए।
रूप मानव का मिला,
सम्मान करना चाहिए॥