अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
*****************************************
समकालीन हिंदी साहित्य के विस्तृत परिदृश्य में कुछ ऐसे व्यक्तित्व उभरते हैं, जिनकी उपस्थिति केवल उनके लेखन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे एक विचारधारा, एक बौद्धिक परम्परा और एक सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं। प्रो. सुशील कुमार शर्मा इसी श्रेणी के ऐसे विशिष्ट साहित्यकार और आलोचक हैं, जिन्होंने अपनी सृजनात्मक और विश्लेषणात्मक दृष्टि के माध्यम से हिंदी आलोचना को एक नई ऊँचाई दी है। वे केवल प्रख्यात शिक्षाविद् नहीं हैं, बल्कि ऐसे संवेदनशील चिंतक हैं, जिनकी दृष्टि साहित्य, समाज और संस्कृति के जटिल संबंधों को समझने और व्याख्यायित करने में सक्षम है।

मिजोरम केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर के रूप में कार्यरत प्रो. शर्मा का जीवन एक ऐसी सतत यात्रा है, जिसमें संघर्ष, साधना, अनुशासन और आत्म-विकास के अनेक आयाम समाहित हैं। उत्तर प्रदेश के एक साधारण ग्रामीण परिवेश से निकलकर उन्होंने जिस प्रकार राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है, वह उनकी अदम्य इच्छाशक्ति और परिश्रम का परिणाम है। गौतम बुद्ध नगर जिले के सैंथली ग्राम से प्रारंभ हुई उनकी जीवन-यात्रा यह विश्वास दिलाती है कि यदि व्यक्ति में दृढ़ निश्चय और निरंतर प्रयास की भावना हो तो सीमित संसाधन भी किसी प्रतिभा के विकास में बाधा नहीं बन सकते।
प्रो. शर्मा के व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पहलू उनकी जड़ों से गहरा जुड़ाव है। उन्होंने आधुनिक शिक्षा और वैश्विक अनुभव प्राप्त करने के बावजूद अपने भीतर के उस ग्रामीण संस्कार को जीवित रखा है, जो उन्हें संवेदनशील, सहृदय और मानवीय बनाता है। यही कारण है, कि उनके व्यक्तित्व में एक ओर आधुनिकता की बौद्धिक चमक है, तो दूसरी ओर लोक-जीवन की सरलता एवं सहजता भी विद्यमान है। उनके भीतर का यह संतुलन उन्हें एक ऐसा आलोचक बनाता है, जो न केवल ग्रंथों का अध्ययन करता है, बल्कि जीवन के विविध अनुभवों को भी अपनी आलोचना-दृष्टि में समाहित करता है।
उनकी बौद्धिक संरचना में निर्भीकता, स्पष्टता और स्वतंत्र चिंतन का विशेष स्थान है। इस दृष्टि से उनके व्यक्तित्व में कबीर दास जैसी बेबाकी और सत्य कहने का साहस दिखाई देता है। वे किसी भी विचार या परम्परा को परीक्षण के बिना स्वीकार नहीं करते, बल्कि उसे अपने विवेक की कसौटी पर परखते हैं, साथ ही उनके आलोचना-कर्म में गोस्वामी तुलसीदास जैसी समन्वयवादी प्रवृत्ति भी दिखाई देती है, जिसमें विरोधी विचारों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। यह संतुलन ही उनकी आलोचना को एक विशिष्ट पहचान देता है।
आपकी की सादगी और विनम्रता आपके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है। आज के प्रतिस्पर्धात्मक और आत्मकेंद्रित वातावरण में जहाँ विद्वत्ता अक्सर प्रदर्शन का माध्यम बनती जा रहहीं है, वहाँ उन्होंने ज्ञान को सेवा और साझा करने का माध्यम बनाया है। उनके व्यवहार में एक प्रकार की आत्मीयता और सहजता है, जो उनके छात्रों और सहकर्मियों को उनके प्रति आकर्षित करती है, अपना बनाए रखती है। वे अपने विद्यार्थियों के लिए केवल शिक्षक नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत हैं, जो उन्हें न केवल शैक्षणिक रूप से, बल्कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में भी दिशा देते हैं।
लगभग ३ दशक से अधिक के शैक्षणिक जीवन में उन्होंने हजारों विद्यार्थियों को शिक्षित किया है और अनेक शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया है। उनके निर्देशन में अनेक विद्यार्थियों ने उच्च शोध उपाधियाँ प्राप्त की हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि वे शोध के क्षेत्र में गहराई और मौलिकता को कितना महत्व देते हैं। वे विद्यार्थियों को केवल जानकारी देने के बजाय स्वतंत्र रूप से सोचने और प्रश्न करने के लिए प्रेरित करते हैं, ताकि हर विद्यार्थी विचारवान बने, चिंतन करे और बेहतर नागरिक बने, क्योंकि उनके लिए शिक्षा का अर्थ केवल परीक्षा उत्तीर्ण करना नहीं, बल्कि बौद्धिक विकास और व्यक्तित्व निर्माण है।
अगर आलोचना के क्षेत्र में देखें प्रो. शर्मा का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने हिंदी आलोचना को पारम्परिक सीमाओं से बाहर निकालकर उसे एक व्यापक सांस्कृतिक और दार्शनिक संदर्भ में स्थापित किया है। उनकी आलोचना में केवल पाठ का विश्लेषण नहीं होता, बल्कि पीछे छिपे सामाजिक, ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक आयामों की भी गहन पड़ताल की जाती है। यही कारण है, कि उनकी कृतियाँ केवल साहित्यिक मूल्यांकन तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे पाठकों को नए दृष्टिकोण और विचार देती हैं। आपकी प्रमुख कृति ‘मधुमालती में प्रेम-व्यंजना’ इस संदर्भ में अत्यंत उल्लेखनीय है। इस ग्रंथ में उन्होंने मध्यकालीन सूफी काव्य की एक महत्वपूर्ण रचना का सूक्ष्म और गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया है। उन्होंने प्रेम को केवल एक भावनात्मक अनुभव के रूप में नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और दार्शनिक सत्य के रूप में देखा है। उनके अनुसार प्रेम वह शक्ति है, जो मनुष्य को सीमाओं से मुक्त कर एक व्यापक चेतना से जोड़ती है। इस दृष्टि से उनका विश्लेषण साहित्यिक के साथ दार्शनिक भी है।
उन्होंने मंझन और जायसी जैसे कवियों की तुलना करते हुए सूफी काव्य की विभिन्न प्रवृत्तियों को स्पष्ट किया है। उनका यह निष्कर्ष कि मंझन का प्रेम अधिक निस्पृह और आध्यात्मिक है, हिंदी साहित्य के अध्ययन में एक नई दिशा प्रदान करता है। इस प्रकार उनकी यह कृति न केवल एक विशिष्ट ग्रंथ का विश्लेषण है, बल्कि यह सूफी साहित्य की व्यापक समझ विकसित करने में भी सहायक है।
इसी प्रकार उनकी दूसरी महत्वपूर्ण कृति ‘रामचरितमानस में नारी’ हिंदी आलोचना के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में देखी जाती है। इस ग्रंथ में उन्होंने उस धारणा का खंडन किया है, जिसके अनुसार तुलसीदास को नारी-विरोधी माना जाता है। उन्होंने अपने तर्कों और उदाहरणों द्वारा यह सिद्ध किया है कि ‘रामचरितमानस’ में नारी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और सम्मानजनक है।
उन्होंने सीता, कौशल्या, अनुसूया जैसे आदर्श पात्रों के साथ-साथ शूर्पणखा और मंथरा जैसे जटिल चरित्रों का भी गहन विश्लेषण किया है। उनका यह विश्लेषण दर्शाता है कि वे किसी भी रचना को एकांगी दृष्टि से नहीं देखते, बल्कि उसके सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए उसका मूल्यांकन करते हैं। वे युगीन संदर्भों को समझते हुए पाठ की व्याख्या करते हैं, जिससे आलोचना अधिक संतुलित और प्रासंगिक बन जाती है।
प्रो. शर्मा का मानना है कि साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज के निर्माण और परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण साधन है। इसलिए उनकी आलोचना में सामाजिक सरोकारों को विशेष महत्व है, तो रचनाओं में मानवीय संवेदनाएँ, नैतिक मूल्य और सामाजिक जिम्मेदारियाँ स्पष्ट रूप से दिखती हैं।
पूर्वोत्तर भारत में हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार में उनका योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मिजोरम जैसे राज्य में जहाँ हिंदी की उपस्थिति सीमित है, वहाँ उन्होंने न केवल शिक्षण कार्य किया, बल्कि हिंदी के प्रति जागरूकता और रुचि उत्पन्न करने का भी प्रयास किया। यह कार्य केवल एक शिक्षक का नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दूत का कार्य है, जो विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के बीच संवाद स्थापित करता है।
उन्होंने अपने जीवन में अनेक संघर्षों का सामना किया, लेकिन कभी हार नहीं मानी। यह कहा जा सकता है कि प्रो. शर्मा एक ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने अपने जीवन और कृतित्व के माध्यम से हिंदी साहित्य और आलोचना को समृद्ध किया है। उनका जीवन हमें प्रेरणा देता है कि सच्ची आलोचना निष्पक्षता में और सच्ची साधना समाज के प्रति समर्पण में निहित होती है। प्रो. शर्मा इन एक ऐसे आलोक-स्तम्भ हैं, जिनकी रोशनी हिंदी साहित्य के पथ को लम्बे समय तक प्रकाशित करती रहेगी।