तो क्या करूँ

निर्मल कुमार शर्मा  ‘निर्मल’ जयपुर (राजस्थान) ***************************************************** ये फ़ितरत में है मेरी,कि,अयाँ करता बयाँ हूँ मैं, अनानीयत,इसे समझे कोई,तो क्या करूँ फिर मैं। गालिब नहीं,ग़ाज़ी नहीं,ना गैर-मामूली हूँ मैं, इंसां हूँ,ना समझे कोई,तो क्या करूँ फिर मैं। करूँ पुरजोर और पुरजोश,बातें हक़ की सबके मैं, फ़क़त लस्सान,गर,समझे कोई,तो क्या करूँ फिर मैं। राहे-हक़ में ह़िफ़्ज़े मरातिब,रखता … Read more

मन भर सोना दान

अवधेश कुमार ‘आशुतोष’ खगड़िया (बिहार) **************************************************************************** मंदिर में करते बहुत,मन भर सोना दान। भूखा खातिर है नहीं, एक अदद पकवान।। भगवन तो खाते नहीं,उन्हें चढ़े पकवान। जिनको को रोटी चाहिए,उन्हें मिला अपमानll भगवन आदी हो गए,नित सुनने को शोर। मंदिर-मस्जिद है जहां,बजता भोंपू जोरll जो जग को नित चालते,देते हर सुख भोग। उनको मंदिर में … Read more

सच कहता हूँ…

ओम अग्रवाल ‘बबुआ’ मुंबई(महाराष्ट्र) ****************************************************************** सच कहता हूँ मान बेचकर,मैं सम्मान नहीं लेता हूँ। अन्तर्मन के आँसू का,मैं बलिदान नहीं लेता हूँ। मुझे बिलखते बच्चों की,पीड़ा सहन नहीं होती। छोड़ गोद के बच्चे को,मैं भगवान नहीं लेता हूँ॥ पकवानों से सजा थाल भी,मुझको रास नहीं आता। परिधान भूप-सा पाऊँ वो भी,मुझको खास नहीं भाता। टूटे … Read more

प्रकृति,पृथ्वी और प्रगति में संतुलन आवश्यक

सुश्री नमिता दुबे इंदौर(मध्यप्रदेश) ******************************************************** मनुष्य विकास के पथ पर बड़ी तेजी से अग्रसर है,उसने समय के साथ स्वयं के लिए सुख के सभी साधन एकत्र कर लिए हैं। बढ़ते विकास तथा समय के साथ आज हमारी असंतोष की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही है। प्रकृति में ऊर्जा संसाधन सीमित हैं, अतः यह आवश्यक हो … Read more

पृथ्वी के मुख पर कालिख़

डाॅ.आशा सिंह सिकरवार अहमदाबाद (गुजरात )  **************************************************************** विश्व धरा दिवस स्पर्धा विशेष……… जब मैं जन्मी, पूरी की पूरी पृथ्वी मेरे इर्द-गिर्द थी, पहाडों से फूटते झरने सरसराते पेड़ों से लिपटी लताएँ, खिलखिलाते अनगिनत फूल घनघोर बरसती हुई बारिश और हवा ने, मेरी नन्हीं-नन्हीं हथेलियों को चूम लियाl बचपन की हर सुबह, मैदानों में होती थी … Read more

हिंसक सत्ता की नाकामी

डॉ.वेदप्रताप वैदिक गुड़गांव (दिल्ली)  ********************************************************************** महावीर जयंती के अवसर पर हार्वर्ड कैनेडी स्कूल की एक रपट दुनिया के आंदोलनों पर छपी है। यह खोजपूर्ण रपट इस मुद्दे पर छपी है कि पिछले १०० वर्षों में कितने हिंसक आंदोलन सफल हुए हैं और कितने अहिंसक ? इसके मुताबिक ३६ प्रतिशत हिंसक आंदोलन सफल हुए हैं जबकि … Read more

सीख गई सबक निम्मी

निशा सतीशचन्द्र मिश्रा यामिनी मुंबई(महाराष्ट्र) ************************************************ निम्मी अभी कॉलेज से आती ही होगी, यह सोच जल्दी-जल्दी घर के काम को आभा निपटाते हुए जल्दी से किचन में जाकर दोपहर के खाने की तैयारी करने लगी।सारा काम ख़तम होने के बाद जैसे ही आभा सोफे पर बैठी ही थी कि,दरवाजे की घंटी बजी और बाहर से चिल्लाने … Read more

धरती माँ की रक्षा अनिवार्य

आरती सिंह ‘प्रियदर्शिनी’ गोरखपुर(उत्तरप्रदेश) ***************************************************************************************** विश्व धरा दिवस स्पर्धा विशेष……… आज सारी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग जैसी अंतरराष्ट्रीय समस्या से जूझ रही है,यद्यपि कई देशों की सरकारों द्वारा कई कदम उठाए गए हैं फिर भी आज दिनों-दिन पर्यावरणीय ह्रास, वायु तथा जल प्रदूषण में बढ़ोतरी,ओजोन परत में कमी,औद्योगिकरण,वन कटाई इत्यादि से तेलों का फैल जाना,पावर प्लांट,कीटनाशक … Read more

कांग्रेस पर बांस की बोराई

राकेश सैन जालंधर(पंजाब) ***************************************************************** राजस्थानी में कहावत है-‘केला,बिच्छी,केकड़ा वनस्पतियों में बांस,अपने जन्मे आप मरे या फिर सत्यानाश।’ यानि केला व बांस जिन्दगी में एक ही बार फल-फूल देते हैं और बांस के फूल अकाल या विपत्ति का संकेत हैं। चैत्र और वैशाख में वनस्पति जगत में बोराई यौवन पर है और देश की सबसे पुरानी … Read more

हरी-भरी हो धरा

निर्मल कुमार जैन ‘नीर’  उदयपुर (राजस्थान) ************************************************************ विश्व धरा दिवस स्पर्धा विशेष……… लो संकल्प- हरी-भरी हो धरा, नहीं विकल्प। एक ही नारा- प्रदूषण मुक्त हो, देश हमारा। बीमार मन- उगे चारों तरफ़, कांक्रीट वन। कटते वन- बंजर धरती से, दुःखी है मन। एक ही दवा- पेड़-पौधों से मिले, शीतल हवा। पृथ्वी बचाओ- स्वस्थ और सुंदर, … Read more