आशाओं की डोर…
संजय वर्मा ‘दृष्टि’ मनावर(मध्यप्रदेश)***************************************** जीवन के रंग (मकर संक्रांति विशेष) कटती डोर दुखता मन,पतंग किससे कहेजीवन के रंग उलझे हुए,जिंदगी के धागे सुलझाने मेंउम्र बीत जाती। निगाहें कमजोर हो जाती,कटी पतंगलेती फिर से इम्तहान,जो कट केआ जाती पास हौंसला देने। हवा और तुम से ही,मैं रहती जीवितउड़ाओ मकर संक्रांति पर मुझे,मैं पतंग हूँउड़ना जानती,तुम्हारे काँपते हाथों … Read more