जिंदगी का सलीका
ममता तिवारीजांजगीर-चाम्पा(छत्तीसगढ़)************************************** जले लफ्ज़ फिर से गये जाग कैसे,दबे तह कुरेदा दिले दाग कैसे ?बुझा कर मजे से जिये जा रहे थे-धुँआ है भभकता लगे आग कैसे ?? उसे जिंदगी का सलीका न आया,बहुत मिन्नतें की,तरीका न आया।बने जिंदगी पढ़ के कातिब-ए-आला-करे क्या उसे पर वजीफ़ा न आया॥ कलमकार है वो तो दिल की लिखेगा,सदा … Read more