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इंसानियत के दुश्मन

अमल श्रीवास्तव 
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

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कहां खो गई ममता,करुणा,
क्यों तुम इतने क्रूर हो गए ?
यत्र,तत्र,सर्वत्र मिलावट,
कितना मद में चूर हो गए ?

अपनी सुख-सुविधा की खातिर,
ले लेते कितनों की जानें।
पेटी,कोठी,कोठा,भरने,
बुनते रहते ताने-बाने।
मतलब के हित नहीं हिचकते,
तुम शोषण,उत्पीड़न करने।
क्या विक्रेता ? क्या उपभोक्ता,?
कैसे ? ठगे जा रहे कितने ?

स्वार्थ वृत्तियों के चंगुल में,
क्यों इतना मजबूर हो गए ?
यत्र,तत्र,सर्वत्र मिलावट,
कितना मद में चूर हो गए… ?

झूठ बोल,अपमिश्रण करके,
कुछ क्षण का सुख मिल जाता है,
लेकिन दीर्घ काल में केवल,
सत्य विजय श्री को पाता है।
ऐसे छल,प्रपंच के द्वारा,
जो सम्पत्ति,भोग,सुख पाना।
मानो रक्त,माँस,चरबी से,
मिश्रित,दूषित व्यंजन खाना।

‘सत्य-शिवम-सुंदरम’ से भी,
कैसे ? इतना दूर हो गए।
यत्र,तत्र,सर्वत्र मिलावट,
कितना मद में चूर हो गए…?

आज मिलावट ने दुनिया में,
कैसा,कितना ? कहर ढहाया।
खान-पान,विषयुक्त हो गया,
तन दुर्बल है,मन मुरझाया।
हवा प्रदूषित,दवा विषैली,
अन्न-अशुचि,जल भी मटमैला।
धूमिल-दृष्टि,और कर्कश-ध्वनि,
पूरा वातावरण कसैला।

मानवता का गला घोंटकर,
दानव बन,मगरूर हो गए।
यत्र,तत्र,सर्वत्र मिलावट,
कितना मद में चूर हो गए…?

चारों तरफ कसक,सिसकन से,
कैसे नींद तुम्हें आती है।
पर-पीड़ा से पिघल न पाती,
कैसी पाषाणी छाती है।
निशि दिन करुण कराहें सुनकर,
बंशी कैसे बज पाती है ?
मृदुता की फुलवारी कैसे ?
तड़प-तड़प झुलसी जाती है।

न्याय नहीं कर पाए लेकिन,
अन्यायी मशहूर हो गए।
यत्र,तत्र,सर्वत्र मिलावट,
कितना मद में चूर हो गए…?

जियो और जीने दो सबको,
ऐसी सीख मिली है हमको।
सबमें ही परमात्व तत्व है,
सुखी समृद्धि करें इस जग को।
हत्या से भी घातक होता,
जुर्म मिलावट खोरों का है।
सीधे सूली पर लटकाना,
यही दंड इन चोरों का है।

मारो,काटो,लूट मचाओ,
दुनिया के दस्तूर हो गए।
यत्र,तत्र,सर्वत्र मिलावट,
कितना मद में चूर हो गए…?

लेकिन मानवता की खातिर,
अवसर एक प्रदान करेंगे
प्रायश्चित कर सकें पाप का,
ऐसा अनुसंधान करेंगे।
सुधर गए तो अच्छा ही है,
मुख्य मार्ग में आ जाने दो।
नहीं बदलते,तो मत रोको,
फांसी पर फिर चढ़ जाने दो।

पंछी को छाया कब मिलती,
ऐसे पेड़ खजूर हो गए।
यत्र,तत्र,सर्वत्र मिलावट,
कितना मद में चूर हो गए…॥

परिचय-प्रख्यात कवि,वक्ता,गायत्री साधक,ज्योतिषी और समाजसेवी `एस्ट्रो अमल` का वास्तविक नाम डॉ. शिव शरण श्रीवास्तव हैL `अमल` इनका उप नाम है,जो साहित्यकार मित्रों ने दिया हैL जन्म म.प्र. के कटनी जिले के ग्राम करेला में हुआ हैL गणित विषय से बी.एस-सी.करने के बाद ३ विषयों (हिंदी,संस्कृत,राजनीति शास्त्र)में एम.ए. किया हैL आपने रामायण विशारद की भी उपाधि गीता प्रेस से प्राप्त की है,तथा दिल्ली से पत्रकारिता एवं आलेख संरचना का प्रशिक्षण भी लिया हैL भारतीय संगीत में भी आपकी रूचि है,तथा प्रयाग संगीत समिति से संगीत में डिप्लोमा प्राप्त किया हैL इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकर्स मुंबई द्वारा आयोजित परीक्षा `सीएआईआईबी` भी उत्तीर्ण की है। ज्योतिष में पी-एच.डी (स्वर्ण पदक)प्राप्त की हैL शतरंज के अच्छे खिलाड़ी `अमल` विभिन्न कवि सम्मलेनों,गोष्ठियों आदि में भाग लेते रहते हैंL मंच संचालन में महारथी अमल की लेखन विधा-गद्य एवं पद्य हैL देश की नामी पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैंL रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी केन्द्रों से भी हो चुका हैL आप विभिन्न धार्मिक,सामाजिक,साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़े हैंL आप अखिल विश्व गायत्री परिवार के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। बचपन से प्रतियोगिताओं में भाग लेकर पुरस्कृत होते रहे हैं,परन्तु महत्वपूर्ण उपलब्धि प्रथम काव्य संकलन ‘अंगारों की चुनौती’ का म.प्र. हिंदी साहित्य सम्मलेन द्वारा प्रकाशन एवं प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री सुन्दरलाल पटवा द्वारा उसका विमोचन एवं छत्तीसगढ़ के प्रथम राज्यपाल दिनेश नंदन सहाय द्वारा सम्मानित किया जाना है। देश की विभिन्न सामाजिक और साहित्यक संस्थाओं द्वारा प्रदत्त आपको सम्मानों की संख्या शतक से भी ज्यादा है। आप बैंक विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. अमल वर्तमान में बिलासपुर (छग) में रहकर ज्योतिष,साहित्य एवं अन्य माध्यमों से समाजसेवा कर रहे हैं। लेखन आपका शौक है।

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