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वरदान-सी हिंदी

डॉ. अन्नपूर्णा श्रीवास्तव
पटना (बिहार)
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अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस स्पर्धा विशेष….

हमारा मान है हिन्दी,
हमारी शान है हिन्दी
सृजन की कल्पना हिन्दी-
सृजन सम्मान है हिन्दी।

सरस इतनी कि उच्चारित हो,
मृदुल झंकार-सी लगती
बुलाते माँ को जब इसमें-
अमृत की धार-सी लगती।
जो करती प्रार्थना प्रभु की,
लगे वरदान-सी हिन्दी॥

सजी सपनों-सी आँखों में,
हृदय में प्यार-सी उमड़ी
अभिव्यक्ति का माध्यम यह-
ये वाणी-वीणा से उतरी।
सुता यह संस्कृत की है,
संस्कृति की जान है हिन्दी॥

ये आँगन सूर-तुलसी के,
प्रभु की लीला में सजती
मीरा के प्रेम गीतों में-
समर्पण की कथा लिखती।
कबीर रसखान के भावों की,
सुंदर तान है हिन्दी॥

बने अक्षर जो वर्ण इसके,
सजा शब्दों की वरमाला
सदा विज्ञान सम्मत यह-
वेदों ने भी है संभाला।
सजे साहित्य ग्रिवा में,
सुकवि पहचान है हिन्दी॥

नहीं नफरत है इंग्लिश से,
मगर हिन्दी है माँ अपनी
बने अब राष्ट्रभाषा यह-
यही दिल की दुआ अपनी।
फहराए विश्व में परचम,
शिवम् आह्वान है हिन्दी॥