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जो भोगा, वही रचा

ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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मर्म रचयिता (मुंशी प्रेमचंद विशेष)….

अध्यापक, संपादक, लेखक, उपन्यासकार थे प्रेमचन्द,
हिंदी जगत के सर्वमौलिक, उपन्यासकार थे प्रेमचंद।

वास्तव में एक सच्चे कलाकार थे, मुंशी प्रेमचंद 
जीवन में जो भी भोगा, वही साहित्य में रचे प्रेमचंद 

३१ जुलाई, १८८० में लमही ग्राम बनारस में हुआ जन्म,
१८८५ में प्रेमचंद ने मौलवी से उर्दू शिक्षा की ग्रहण।

माता आनंदी देवी, पिता थे मुंशी अजायब राय की संतान,
भारी गरीबी और संघर्षों में ही बीता प्रेमचंद का बचपन।

मुंशी प्रेमचंद के बचपन का नाम था धनपत राय,
पहला शुरुआती लेखन उर्दू में, नाम था नवाब राय।

१८९५ में बनारस हाईस्कूल में शिक्षारत थे, विवाह हुआ,
पत्नी शिवरानी देवी के साथ इनका जीवन निर्वाह हुआ।

पहली पत्नी थी जमीॅदार की बेटी, उनके साथ नहीं पटी,
दूसरी पत्नी शिवरानी देवी, जो कि जीवन संगिनी रही।

उनके एक पुत्र प्रसिद्ध हुए लेखक और जीवनीकार,
‘कलम का सिपाही’ को मिला साहित्य अकादमी पुरस्कार।

दूसरा पुत्र श्रीपत राय, जो कि साहित्येत्तर और लेखन से जुड़े
प्रेमचंद की पहली कहानी ‘संसार का सबसे अनमोल रत्न’ थी।

प्रेमचंद ने कुल ग्यारह लिखे, उपन्यास- प्रेमा, सेवासदन, वरदान 
प्रेमाश्रय, निर्मला, रंगभूमि, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान।

शरतचंद्र और अन्य ने नाम दिया, प्रेमचंद उपन्यास सम्राट 
रंगभूमि को १९२५ में मंगला प्रसाद पारितोषिक पुरस्कार।

स्वभावतः प्रगतिशील होता है, साहित्यकार या कलाकार 
अगर यह स्वभाव न होता तो शायद, वह न होता साहित्यकार।

उसके अपने अंदर एक कमी-सी, होती है और बाहर भी 
हमारी कसौटी पर वही साहित्य, खरा जिसमें उच्च चिंतन हो।

जिसमें स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो
सृजन की आत्मा हो, जीवन में, सच्चाई का प्रकाश हो।

उनका यही अंतिम भाषण था, पेट में अल्सर था,
इस कारण ८ अक्तूबर को सवेरे आई मूर्च्छा।

१९३६ को मुंशी प्रेमचंद जी का देहावसान हो गया,
संघर्षरत जुझारू साहित्यकार कहीं विलीन हो गया॥