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नींव का पत्थर

डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्ल
इन्दौर (मध्यप्रदेश)
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मजदूर दिवस विशेष….

खाली सड़क पर उसकी साइकिल हवा से बातें कर रही थी। एक धीरे चल रहे स्कूटर से जब वह आगे निकला, तो उसके चेहरे पर चमक आ गई और पाँव जैसे मशीन बन गए।
“धीरे चलाओ… कहीं हम दोनों गिर गए तो ?”
“चिंता मत कर…. मैं चोट खा लूंगा, लेकिन तुझे बचा लूंगा!”
“आज बहुत खुश लग रहे हो! क्या बात है ?”
“हाँ, आज मेरा मन बहुत खुश है।”
“मुझे भी तो बताओ, अपनी लुगाई से, धनी कोई बात छुपाता नहीं…!”
“थोड़ा-सा सब्र और कर ले…. तेरा भी मन खुश हो जाएगा।”
     एक नए मकान के सामने उसने साइकिल रोकी। सारा मकान फूलों और बल्बों से जगमगा रहा था। गार्डन में भव्य पार्टी चल रही थी।संगीत बज रहा था। उत्सव जैसा माहौल था।
“धनिया! यह मकान मैंने बनाया…!”
“तुमने…?”
“…हाँ, मेरे जीवन का यह पहला मकान है, जिसमें मैंने काम किया!”
“…तो मुहूरत में तुम्हें क्यों नहीं बुलाया ?”
“कैसे बुलाते…? उनकी शान में बट्टा जो लगता ? अरे… मैं मजदूर हूँ… मजदूर! गारा-सीमेंट ढोने वाला…!”