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शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया और गिरता स्तर

डॉ. रामवृक्ष सिंह
लखनऊ (उप्र)
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मेरे अनुभव और मतानुसार शिक्षकों, विशेषकर महाविद्यालयीन शिक्षा के स्तर में गिरावट का मुख्य कारण है – शिक्षकों के चयन में धाँधली, भाई-भतीजावाद, प्रतिभा एवं योग्यता की अनदेखी करके केवल अपने चहेतों की नियुक्ति करने का व्यापक प्रचलन। हालांकि, स्नातक स्तर के संस्थानों में असिस्टेंट प्रोफेसर बनने के लिए राष्ट्रीय स्तर की पात्रता परीक्षा (एनईटी) उत्तीर्ण करना आवश्यक है, किन्तु उसमें प्रत्येक विषय के लिए हजारों की संख्या में अभ्यर्थी उत्तीर्ण होते हैं। जब किसी महाविद्यालय में रिक्ति निकलती है, तो उक्त सभी उत्तीर्ण अभ्यर्थी आवेदन करने के लिए पात्र होते हैं। आवेदक अभ्यर्थियों का अन्तिम चयन साक्षात्कार के आधार पर होता है। साक्षात्कार ही नियुक्ति का निर्णायक आधार होता है। उच्च शिक्षा के लिए अभ्यर्थियों के विश्वविद्यालयों तक पहुँचने की अंतर्कथा भी बहुत रोचक है। एक विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष से अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने बताया, कि तत्सम्बन्धी विभागाध्यक्षों को ऐसे छात्रों की दरकार होती है जो उनके छोटे-मोटे घरेलू एवं शासकीय कामों में मदद कर सकें, सेवा-टहल कर सकें और ज़रूरत पड़ने पर धरना-प्रदर्शन, दादागिरी, बल-प्रदर्शन आदि के काम भी आ सकें। शिक्षकों के बहुत-से पट्ट शिष्य और प्रिय शिष्याएँ बन जाती हैं। शोध स्तर तक आते-आते इन सम्बन्धों में माधुर्य का इतना परिपाक हो जाता है, कि अकादमिक सरोकार उसके आगे फीके पड़ने लगते हैं। छात्र-छात्राओं में बहुत-से युवक-युवतियाँ विभिन्न प्रोफेसरों के बेटा-बेटी अथवा भाई-भतीजे भी होते हैं। विवि एवं महाविद्यालयों के उर्वर वातावरण में संकाय एवं छात्र-छात्राओं के मध्य रागात्मक सम्बन्धों का पुष्पन-पल्लवन कितनी तीव्रता एवं त्वरा से होता है, यह विश्व-विश्रुत तथ्य है। इन सभी समीकरणों का परिणाम सर्वज्ञात है। तथापि, स्पष्टता की दृष्टि से बता दें कि जब महाविद्यालयों में साक्षात्कार के आधार पर असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति होती है तो मेरिट और श्रेष्ठता को धत्ता बताते हुए यही समीकरण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

अपने यहाँ एक कहावत है- “जब सैयां भये कोतवाल तो डर काहे का!” हमारे विवि में जगह-जगह कोतवाल सैयाँ बैठे हुए हैं। वे उच्च अध्ययन से लेकर नियुक्ति तक अपने ही लोगों का चयन करते हैं। और कोई कुछ नहीं बोलता। किसी भयवश, संकोचवश, उदासीनता अथवा लिहाज के कारण सभी चुप रहते हैं। चयन-समितियों में सम्बन्धित संस्थान, संकाय अथवा महाविद्यालय अपने मनोनुकूल विशेषज्ञों के नाम रखते हैं। चुने जानेवाले अभ्यर्थियों के नाम साक्षात्कार प्रक्रिया के पहले ही निर्धारित कर लिए जाते हैं। पूर्व-चयनित अभ्यर्थी से ऐसे सवाल पूछे जाते हैं, जो या तो उसे पहले से बता दिए गए होते हैं या जिन पर उसकी पकड़ अच्छी होती है। एक मिसाल है- यदि किसी को उत्तीर्ण करना है, तो उससे उसके पिता का नाम पूछिए और अनुत्तीर्ण करना है तो उससे अपने पिता का नाम पूछिए। यही इन दिखावटी साक्षात्कारों में होता है। समिति का सबसे दबदबे वाला वाला विद्वान अथवा विदुषी, अथवा सम्बन्धित संस्थान का मुखिया अपने मनोनुरूप अभ्यर्थी का चयन कर लेता है और शेष सदस्य उसके निर्णय पर समर्थन का ठप्पा लगा देते हैं। इस अनुग्रह के एवज में विशेषज्ञों की तरह-तरह से पूजा की जाती है। यदि वे बाहर से आए हों तो बढ़िया होटल में टिकाया जाता है, बढ़िया भोजन कराया जाता है, पर्यटन और अच्छे उपहार की व्यवस्था की जाती है। निष्कर्ष यह, कि बिकने के लिए पूरी तरह तैयार होकर आए इन विशेषज्ञों को खरीद लिया जाता है। ज़ाहिर-सी बात है, यह सौजन्य लौटाना भी होता है। गधे और ऊँट की अहो रूपं, अहो ध्वनि वाली पंचतंत्रीय परम्परा का बखूबी निर्वाह करते हुए जब कभी किसी विशेषज्ञ-विशेष के संस्थान में ऐसी नियुक्ति होती है, तब वह भी अपने पसंदीदा प्रोफेसर को विशेषज्ञ के रूप में बुलाता है और पूर्वोक्त प्रक्रियाएँ दुहराता है। इस समस्त कलुषाचार का दुष्परिणाम यह निकलता है, कि शिक्षण जैसे पवित्र पेशे में ऐसे-ऐसे नमूने सहायक आचार्य और आचार्य का प्रतिष्ठित पद पा जाते हैं, जो वस्तुतः क्लर्क बनने के योग्य भी नहीं थे। उन्हें न तो विषय की कोई समझ अथवा जानकारी होती है, न ही कुछ सीखने-सिखाने का रुझान उनमें होता है। किंचित, विषयान्तर करते हुए कहें तो गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा वर्णित ‘सिर धुनि गिरा लागि पछिताना’ वाली स्थिति बन जाती है। माँ सरस्वती भी खिन्न मन से सोचती होंगी कि कैसे-कैसे मूर्खों से मेरा पाला पड़ रहा है। ऐसे महारथी बस एक ही कला में पारंगत होते हैं। वह है तिकड़मबाजी। वे न स्वयं पढ़ते हैं, न छात्रों को कुछ पढ़ाते हैं। उन्हें लिखने का शऊर भी नहीं होता। चूँकि, अपनी तिकड़म के बल पर वे महत्त्वपूर्ण पद पा गए होते हैं, इसलिए समाज में उनकी पूछ-परख बढ़ जाती है। यह समाज भी अजीब है। वह व्यक्ति की मेधा, परिश्रमपूर्वक अर्जित विद्वत्ता एवं योग्यता आदि गुणों को न देखकर उसके पद के चाकचिक्य को देखता है। किसी तरह की तिकड़म भिड़ाकर किसी बड़े पद पर कोई गधा भी आसीन हो जाए तो लोग उसकी आरती करने पहुँच जाते हैं। ऐसे रँगे सियारों और उनके स्वार्थान्ध भक्तों की हमारे अकादमिक जगत में बहुतायत है। कहना न होगा, कि केवल तिकड़म के बल पर आचार्य पद प्राप्त शिक्षकों की रुचि विभिन्न सम्मान समारोहों, बैठकों, सम्मेलनों आदि में अधिक होती है। पठन-पाठन से उन्हें कुछ खास लगाव नहीं होता। पदोन्नति के लिए सेमिनारों में निश्चित संख्या में सहभागिता, शोध-पत्रों एवं पुस्तकों के प्रकाशन आदि का प्रावधान अवश्य किया गया है। सभी के लिए अंक निर्धारित हैं। किन्तु जब पूरे कुएँ में ही भाँग घुली हुई हो, तब इन सभी अनुष्ठानिक गतिविधियों की शुचिता, सदाशयता और प्रासंगिकता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। यदि किसी को संदेह हो तो तनिक गम्भीरता से, स्वयं को पूरे परिप्रेक्ष्य से तटस्थ रखते हुए मात्र द्रष्टा भाव से उपर्युक्त समस्त अवयवों का समालोचनात्मक अध्ययन करे, उसके ज्ञान-चक्षु खुल जाएँगे।
यदि इस परिदृश्य को पूरी तरह बदला नहीं गया तो देश की उच्च शिक्षा और भी गहरे और घिनौने गर्त में गिरती चली जाएगी। हाल ही में चर्चा में आई कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी ए.आई.के चलते दुनिया में रोजी-रोजगार का संकट और भी गहराने वाला है; कतिपय विद्वानों का ऐसा मानना है। ऐसे में या तो पठन-पाठन का काम भी ए.आई. के ही हाथों में चला जाए तो कोई आश्चर्य न होगा। हालांकि, हमें पूरा विश्वास है कि वहाँ भी हमारे तिकड़मबाज गुरुजन कुछ न कुछ जुगत भिड़ा ही लेंगे। सौभाग्य अथवा दुर्भाग्य से, इन पंक्तियों के लेखक का सम्बन्ध भी पढ़ने-लिखने से रहा है। संयोगवश उसे आजीविका के लिए शिक्षक से बिलकुल अलग क्षेत्र में जाना पड़ा। इसलिए शिक्षण-जगत के निरन्तर बढ़े विद्रूप ने उसकी चेतना को मथा है और अन्तर्मन को व्यथित किया है। जीवन के हर क्षेत्र में शिक्षित कार्मिकों, पेशेवरों और कार्यपालकों की आवश्यकता लगातार बनी रही है और आगे भी बनी रहेगी। इसलिए शिक्षा-जगत को लगातार परिमार्जित करते रहना बहुत ज़रूरी है। यह परिमार्जन तब तक अधूरा रहेगा, जब तक उच्च शिक्षा के मठाधीशों, प्रोफेसर संवर्ग के गुरुजनों को पूरी तरह धो-पोंछकर निर्मल नहीं किया जाता। अतः हमारा प्रस्ताव है, कि स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर के शिक्षकों की भर्ती के लिए वैसी ही चयन-प्रक्रिया अपनायी जाए; जैसी आइएएस, पीसीएस आदि अखिल भारतीय एवं प्रदेश स्तरीय शासकीय सेवाओं के लिए प्रचलन में है। असिस्टेंट प्रोफेसर से लेकर प्रोफेसर तक के पदों पर भर्ती के लिए विस्तृत प्रारम्भिक परीक्षा आयोजित की जाए। उसमें उत्तीर्ण होने के उपरान्त सम्बन्धित विषय की गहन परीक्षा और उसमें उत्तीर्ण होनेवाले चुनिंदा अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया जाए। श्रेष्ठता क्रम में चयनित शिक्षकों को सूची बने और रिक्ति-अनुसार महाविद्यालयों-विवि में तैनाती मिले।
आजकल पूरे देश में फेसलेस मानव हस्तक्षेप-रहित प्रणालियों पर ज़ोर दिया जा रहा है। यानी सार्वजनिक जीवन, शासन-अभिशासन के सभी कार्य तत्सम्बन्धी नियमों, संहिताओं और मानदंडों के अनुसार पूर्व-निर्धारित कारण-कार्य श्रृंखला का अनुगमन करनेवाली यांत्रिक व्यवस्था से संचालित हैं। शिक्षकों के पद (और देश की कतिपय अन्य अति महत्त्वपूर्ण संस्थाओं के पद) इस मानव हस्तक्षेप-रहित प्रणाली के माध्यम से क्यों नहीं भरे जा सकते ? इस पृच्छा का समाधान जितना शीघ्र मिल जाए, उतना ही हमारे देश के लिए हितकर रहेगा।

(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुम्बई)