कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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मन कभी-कभी अधीर हो जाता है। व्याकुलता की सारी हदें पार कर जाता है। भाव-विभोरन होकर मन एकदम अकेला, तन्हा और बेरूखा-सा हो जाता है। तब सारी कटी-कड़वी बातें याद आती हैं — कैसे, किसने अपमानित किया, सताया, किस तरह से तोड़ा, अकेला और तन्हा छोड़ दिया।
आजकल या कहें तो पिछले कुछ बरसों से संसार में संवेदनाएँ कहीं खो-सी गई हैं। हर इंसान एक-दूसरे से आगे भागने की होड़ में सबको नीचा दिखा रहा है। सभी अपनों को पराया करके जीवन से निकाल रहे हैं। ऐसी हालत में एक आँसू और दूसरा प्रभु ही बचते हैं, जो अपना बनकर साथ निभाते हैं।
आज हम यह भी महसूस कर रहे हैं कि हर घर में हर सदस्य एक-दूसरे से कितना दूर होता जा रहा है। किसी के पास किसी के साथ बैठने का वक़्त नहीं है। अगर कोई दुखी है तो उसे सुनने का भी समय, या कहें धैर्य, किसी के पास नहीं है।
अगर कोई महिला या लड़की अपनी पीड़ा थोड़ी-सी भी किसी से कह दे, और वह किसी पुरुष वर्ग ने सुन ली, तो फिर उसके साथ पता नहीं क्या-क्या होता है। हजारों में कोई एक होता है, जो आपकी भावनाओं की कद्र करता है। वह तो साक्षात कृष्ण की कृपा होती है आप पर, या फिर पूर्व जन्म का कोई पुण्य, जो आपको ऐसा मित्र मिलता है।
संबंध ही नहीं रहे, फिर संवेदनाएँ कहाँ से आएँगी ? रिश्ता क्यों निभाते हैं लोग इस जग में ? अगर आपका मन साफ है, आप किसी का घर बसा दो, हाथ पकड़कर राह दिखा दो, फिर वही आदमी आपको कहेगा “आपने अपना हाथ काट लिया, आप कुछ न बोलें, मैं आपसे बहुत आगे हूँ।” यानी मतलबी लोग भरे पड़े हैं इस जग में।
हमने कितना अकेलापन महसूस किया होगा तब, जब हमारी ज़िंदगी में अकेले हम थे और आँखों में बस आँसू। साथ भी रहता है तो बस उस तकिए का, जो रातों में हमारा साथ तो दे ही देता है। आपसे जो नफरत करते हैं, उन्हीं के साथ जीवन जीना और प्रेम भी करना — सबसे ज्यादा मुश्किल तो तब होती है, जब यह सब खेल ईश्वर किसी स्त्री के साथ खेल रहे होते हैं। वह स्त्री न तो जी पाती है, न मर पाती है।
हम सब आम इंसान हैं, दर्द छुपा भी नहीं पाते और आँसू दिखा भी नहीं पाते। वह इंसान कितना सौभाग्यशाली होगा, जिसे किसी सच्चे मित्र का सहारा मिला होगा-
आँसू कमजोरी नहीं, स्त्री के तप की धारा हैं,
जो तकिए में नहीं, ईश्वर के खाते में लिखी जाती हैं।
जो अकेले में रोना जानता है, वही भीड़ में मुस्कुराना भी सिखा देता है।