बुढ़ापा

निशा सतीशचन्द्र मिश्रा `यामिनी`
मुंबई(महाराष्ट्र)
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मेरे सिर पर जो हैं
बुढ़ापे के अनगिनत बाल,
उसे छिपाया है,
अपने दुपट्टे से कई साल।
आज भी बाजूओं में रखती हूं वही रफ़्तार,
हसिया,फावड़ा औजारों को उठाए,
न जाने किस्मत ने
सुख-दुख की कितनी राह दिखाई,
अपनी इन्हीं बाजूओं से
अपने परिवार के हर
छोटे-बड़े सपनों की इमारत बनाई,
आज भी रिश्तों की एक मजबूत
रस्सी से,
अपने-आपको बांध रखा है।
कौन कहता है,…
कि बुढ़ापा ज्यादा दिन,
साथ नहीं होता है।
फिर लौट आ गया,
वो खोया हुआ हौंसला,
आज भी वही अंदाज,
पुराना अपने पास रखा है॥

परिचय-निशा सतीशचन्द्र मिश्रा का साहित्यक उपनाम `यामिनी` है। आपकी जन्मतिथि२५ फरवरी १९८५ और स्थान उत्तरप्रदेश है। स्थाई और वर्तमान पता पंतनगर, घाटकोपर(ईस्ट)मुंबई है। महाराष्ट्र राज्य के शहर मुंबई की निवासी निशा मिश्रा की शिक्षा- एम.ए.,बी.एड एवं पी.एच-डी. है। पेशे से आप निजी महाविद्यालय में प्राध्यापिका हैं। लेखन विधा-कविता,लेख और दोहा है। प्रकाशन में ऑनलाइन औरइलाहाबाद के पत्रों में भी रचनाओं को स्थान मिला है। प्राप्त सम्मान में प्रमुख तौर पर ममता कालिया के उपन्यास ‘बेघर’ की समीक्षा पर द्वितीय पुरस्कार २०१८ सहित अच्छे शिक्षक का सम्मान २०१७,मृदुला गर्ग के उपन्यासों की चर्चा पर प्रथम पुरस्कार २०१७ मिला है। यामिनी सामाजिक मीडिया पर भी लिखती हैं। इनकी लेखनी का उद्देश्य-अपनी भावनाओं को लोगों तक विस्तारित करना और हिंदी भाषा की सेवा करना है।

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