भटकाव

वीना सक्सेना
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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पहले के समय में कोई भी कहानी जब हम पढ़ते थे,तो वह शुरू होती थी कि एक समय की बात है,किसी शहर में एक दंपति रहा करते थे। ऐसे ही मैं भी शुरु करती हूं एक शहर में शर्मा दंपति रहा करते थे,उनके दो बच्चे थे। बेटा विदेश में रहता था,और बेटी भारत के किसी सुदूर शहर में रहती थी। यहां पर यह दंपति एकाकी जीवन जी रहे थे। शर्मा जी सेवानिवृत्त थे,जबकि श्रीमती शर्मा सामाजिक कार्यकर्ता थी। अच्छी पेंशन व बचत थी,दोनों बच्चों का विवाह हो गया था,और अब वे जिम्मेदारी मुक्त जीवन जी रहे थे। बच्चे अपने माता-पिता से रोज फोन पर बात करते,खैर-खबर लेते व देते थे। दिन आराम से कट जाता था।
एक दिन शर्मा जी के बेटे का फोन आया कि पापा हम घर वापस आना चाहते हैं,क्योंकि अपना घर अपना ही होता है,बच्चियां भी अब बड़ी हो रही हैं,दादा-दादी के साथ रहेंगी तो अच्छे संस्कार सीखेंगी। सुनकर माता-पिता खुशी से झूम उठे। उनका एक बड़ा-सा मकान था,जिसमें आधे हिस्से में वे रहते थे,और आधा खाली था। उन्होंने उसकी साफ-सफाई,रंग-रोगन करवाया,और एकदम विदेश से लौटे बेटे के लायक बना दिया। बेटा आया तो खुशियों का पारावार नहीं,मजे में दिन कटने लगे। बेटा और बहू दोनों उच्च शिक्षित थे,सो शहर में नौकरी आराम से मिल गई।बच्चों का प्रवेश भी अच्छे विद्यालय में हो गया। सुबह सुबह बहुत भागम-भाग रहती,  किसी का नाश्ता-किसी का टिफिन, दिनभर वह घरेलू कार्य बाई से करवाती। कपड़े धुलवाना,खाना बनाना, बर्तन, झाड़ू,पोंछा करवाते-करवाते ढाई बज जाते थे,कि बच्चियां शाला से आ जाती। उनका खाना-पीना चलता,ये सब करते हुए साढ़े ३-४ बज जाते। तब तक श्रीमती शर्मा थोड़ी थक भी जाती थी,परंतु बच्चों के साथ के मोह में उन्हें थकान महसूस नहीं होती थी। मजे से दिन कट रहे थे। शाम को बेटा-बहू आते,साथ में बैठ खाना खाते,घर में रौनक हो गई थी। बस रोज एक बात होती,बेटा शाम को झुंझलाते हुए घर में घुसता,और शहर में बढ़े हुए ट्रैफिक को कोसता। फिर विदेशों से अपने शहर की तुलना करता। खाना खाता और पूरा परिवार अपने वाले भाग में चला जाता। ऐसे ही ६ महीने गुजर गए।
एक दिन बेटे ने सुझाव दिया-पापा हम फलां कॉलोनी में क्यों नहीं घर लेते,जो मेरे और शिखा के दफ्तर के पास है।  आपको इस मकान (घर,जिसे वह मकान कहता था )का अच्छा मूल्य भी मिल जाएगा। यहां से हमें काफी दूर पड़ता है और दफ्तर से यहां आते हुए मुझे पूरा एक घंटा यातायात से जूझना पड़ता है। पिता जो अब इस उम्र में इतना बड़ा निर्णय नहीं ले पा रहे थे,और सालों से जहां रह रहे थे,उन्हें अपने अड़ोस-पड़ोस से बहुत प्रेम था। पड़ोसी भी अब घर जैसे हो गए थे,दु:ख-सुख में साथ खड़े रहते थे। उन्होंने आना-कानी की,तों रोज इसी बात पर बहस होने लगी। बच्चे भी अब अपनी दादी के हाथ का बना हुआ वही पारम्परिक  खाना खा-खाकर ऊब चुके थे। वह विदेश में रहे थे,अतः उन्हें तरह-तरह के खाना खाने की आदत थी। रोज होटल जाते थे,क्योंकि वहां घर पर खाना बनाने की प्रथा नहीं थी। बहू काम पर जाती थी,उसके पास इतना वक्त नहीं होता था कि वह बच्चों की फरमाइश पूरी कर सके। अब रोज इसी बात पर बहस होने लगी-कभी खाने को लेकर,कभी यातायात  को लेकर। बेटा-बहू अब थोड़े अनमने से रहने लगे,घर में भी अब वह कम बात करते। आते खाना खाते,अपने कमरे में चले जाते। शर्मा दंपति भी सोच में पड़ गए,उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था,और वह घर बेचने का निर्णय भी नहीं ले पा रहे थे। अचानक एक दिन बेटा और बहू खुशी से झूमते हुए घर आए, और पिताजी के हाथ में एक पत्र  थमाया। ‘पापा मुझे आस्ट्रेलिया की एक बड़ी कम्पनी में नौकरी मिल गई है,बहुत बड़ा पैकेज है,मैं अब वहां शिफ्ट कर जाऊंगा।’ सुनकर माता-पिता दंग रह गए और सोच में पड़ गए,कि ये कैसा ज़िंदगी का भटकाव है। अगर उन्होंने बेटे की बातों में आकर यह घर जिसे बेटा मकान समझता था,बेच दिया होता तो…।

परिचय : श्रीमती वीना सक्सेना की पहचान इंदौर से मध्यप्रदेश तक में लेखिका और समाजसेविका की है।जन्मतिथि-२३ अक्टूबर एवं जन्म स्थान-सिकंदराराऊ (उत्तरप्रदेश)है। वर्तमान में इंदौर में ही रहती हैं। आप प्रदेश के अलावा अन्य प्रान्तों में भी २० से अधिक वर्ष से समाजसेवा में सक्रिय हैं। मन के भावों को कलम से अभिव्यक्ति देने में माहिर श्रीमती सक्सेना को कैदी महिलाओं औऱ फुटपाथी बच्चों को संस्कार शिक्षा देने के लिए राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। आपने कई पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया है।आपकी रचनाएं अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुक़ी हैं। आप अच्छी साहित्यकार के साथ ही विश्वविद्यालय स्तर पर टेनिस टूर्नामेंट में चैम्पियन भी रही हैं। `कायस्थ गौरव` और `कायस्थ प्रतिभा` सम्मान से विशेष रूप से अंलकृत श्रीमती सक्सेना के कार्यक्रम आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर भी प्रसारित हुए हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में अनेक लेख प्रकाशित हो चुके हैंl आपका कार्यक्षेत्र-समाजसेवा है तथा सामजिक गतिविधि के तहत महिला समाज की कई इकाइयों में विभिन्न पदों पर कार्यरत हैंl उत्कृष्ट मंच संचालक होने के साथ ही बीएसएनएल, महिला उत्पीड़न समिति की सदस्य भी हैंl आपकी लेखन विधा खास तौर से लघुकथा हैl आपकी लेखनी का उद्देश्य-मन के भावों को अभिव्यक्ति देना हैl

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