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अनकहे शब्द

डॉ. श्राबनी चक्रवर्ती
बिलासपुर (छतीसगढ़)
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लब सिले हैं,
मन जिद्दी है
विचार अडिग है,
सिर्फ आँखें बोलती हैं।

जब भी उसमें बसे समन्दर की,
लहरें मेरे दिल के तट से टकरा कर
प्रेम के कुछ कण बिखेर जाती है,
अनकहे शब्द समझना, सच भारी है।

उसकी खामोशी को समझने की कोशिश में,
बड़ी देर तक इस उधेड़बुन में बीते साल
कितने सुहाने दिन और लंबी रातें,
जैसे रेत, मुठ्ठी से फिसल जाती है।

पर अब और समझने की खातिर,
वक़्त को रोकने की जद्दोजहद न कर।
उस पल‌ को‌ जीने की आरज़ू है,
मेरा वर्तमान और उसका भविष्य दांव पर मत लगा॥