कुल पृष्ठ दर्शन : 287

You are currently viewing अन्न-जल

अन्न-जल

डॉ. प्रताप मोहन ‘भारतीय’
सोलन(हिमाचल प्रदेश)
*****************************************************

मैं बद्दी (हिमाचल प्रदेश) में रहता हूँ और बुआ दमोह (मप्र) में रहती हैं। ३ महीने पहले बुआ जी का फोन
आया। उन्होंने बताया कि, ‘२५ दिसम्बर को मेरे पोते की शादी है और तुम्हें जरूर आना है।’ वैसे भी शादी के
अवसर पर ढेर सारे रिश्तेदारों से मुलाकात हो जाती है, इसलिए मेरा भी प्रयास रहता है कि, मैं इस प्रकार के
प्रत्येक कार्यक्रम में जरूर उपस्थित रहूं।
२५ को उनके यहाँ शादी
थी, तो मैंने २३ दिसम्बर को अपना रेल आरक्षण करा के रख लिया। मैं २३ दिसम्बर को बस से दिल्ली के लिए रवाना हुआ, क्योंकि दिल्ली से आगे के लिए रेलगाड़ी में आरक्षण था। बस जैसे ही दिल्ली की सीमा में घुसी, यातायात बहुत जाम था। १ से डेढ़ घंटा इससे निकलने में लग गया। बस से उतर कर ऑटो से रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ा, तो यहाँ पर भी जाम लगा हुआ था। स्टेशन तक पहुंचने में मुझे आधे घंटे की जगह डेढ़ घंटा लग गया। मेरी ट्रेन शाम को ६ बजे थी और मैं साढ़े छह बजे स्टेशन पहुंचा। ट्रेन के बारे में पता किया तो वो अपने निर्धारित समय पर जा चुकी थी। इस मार्ग पर बसें नहीं जाती हैं और दूसरी ट्रेन भी कल थी। कल जाने का कोई लाभ नहीं था, क्योंकि सारे कार्यक्रम खत्म हो जाते।
हारकर मैं वापस घर लौट
आया। इसी को कहते हैं ‘अन्न-जल’।
शायद बुआ जी के यहाँ का अन्न-जल मेरे नसीब में नहीं था। इसलिए, मेरी ट्रेन छूट गई और मुझे आधे रास्ते से वापस आना पड़ा। वाकई, अन्न-जल में बहुत ताकत होती है। वह जब हमारे नसीब में होता है, तो हम किसी बाधा के बिना उसको ग्रहण करने के लिए पहुंच जाते हैं और जब नसीब में नहीं होता है तो कोई न कोई कारण बन ही जाता है।

परिचय-डॉ. प्रताप मोहन का लेखन जगत में ‘भारतीय’ नाम है। १५ जून १९६२ को कटनी (म.प्र.)में अवतरित हुए डॉ. मोहन का वर्तमान में जिला सोलन स्थित चक्का रोड, बद्दी(हि.प्र.)में बसेरा है। आपका स्थाई पता स्थाई पता हिमाचल प्रदेश ही है। सिंधी,हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले डॉ. मोहन ने बीएससी सहित आर.एम.पी.,एन. डी.,बी.ई.एम.एस.,एम.ए.,एल.एल.बी.,सी. एच.आर.,सी.ए.एफ.ई. तथा एम.पी.ए. की शिक्षा भी प्राप्त की है। कार्य क्षेत्र में दवा व्यवसायी ‘भारतीय’ सामाजिक गतिविधि में सिंधी भाषा-आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का प्रचार करने सहित थैलेसीमिया बीमारी के प्रति समाज में जागृति फैलाते हैं। इनकी लेखन विधा-क्षणिका,व्यंग्य लेख एवं ग़ज़ल है। कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन जारी है। ‘उजाले की ओर’ व्यंग्य संग्रह)प्रकाशित है। आपको राजस्थान द्वारा ‘काव्य कलपज्ञ’,उ.प्र. द्वारा ‘हिन्दी भूषण श्री’ की उपाधि एवं हि.प्र. से ‘सुमेधा श्री २०१९’ सम्मान दिया गया है। विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय अध्यक्ष(सिंधुडी संस्था)होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य का सृजन करना है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद एवं प्रेरणापुंज-प्रो. सत्यनारायण अग्रवाल हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिले,हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए। नई पीढ़ी को हम हिंदी भाषा का ज्ञान दें, ताकि हिंदी भाषा का समुचित विकास हो सके।”