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आतंक और दो बूंद आँसू

पंकज भूषण पाठक ‘प्रियम’
बसखारो(झारखंड)
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उफ़्फ़!!
क्या लिखूँ….?
कैसे लिखूँ….?
इस अबोध की भाँति आज,
कलम हमारी थम गयी।
देखकर यह तस्वीर
रातभर मैं सो नहीं पाया,
आँखों से आँसू रोक न पाया
क्योंकि मेरा जमीर है जिंदा,
मेरी भवनाएं संवेदना है जिंदा
कौन होगा ?
जो यह दृश्य देख न रोया होगा,
क्या गुनाह था इसका ?
जो यूँ खामोश कर किया
माँ-बाप के संग यह भी गयी थी ईश्वर के दर,
कहते बच्चे ईश्वर का रूप होते हैं
तो फिर क्या ईश्वर ने ही ले ली अपनी जान।

कुछ सवाल प्रभु ईशा मसीह से,
गॉड या जीसस
क्या तू भी नहीं रोया जीसस ? देख यह मंज़र,
तुझे भी तो आततायियों ने लटकाया था शूली पर
उसी दर्द को जरा महसूस कर लेते,
कम से कम इस मासूमियत की जान बख़्श देते!
क्या यही फल है तुम्हारी प्रार्थना का ?

और कुछ सवाल ख़ुदा से,
या अल्लाह !
या ख़ुदा क्या कहूँ तुझको,
क्या मर गया ज़मीर तेरा भी ?
जो तुम्हारे नाम पर सब कर रहे जिहाद
क्या यही है जिहाद…?
ऊँची-ऊँची मस्जिदों में लगे भौंपू से
क्या इसीलिए तुझे रोज सब देते अजान,
कि आँख मूंद लो,जान कर भी बनो अनजान!
तुम्हारे नाम पर जो जिहादी तैयार होते हैं,
क्यूँ बन जाता है आत्मघाती बम
एक सोलह-सत्रह साल का जवान ?
क्योंकि तुम्हारे नाम पर,
उन्हें दिखाया जाता है ख़्वाब!
जन्नत और ७२ हूरों का!
क्या निर्दोष और मासूमों की बलि लेकर
तुम देते हो उन्हें जन्नत नसीब ?
और कितनी हूरें है तेरे घर,
जो हर जिहादी को तुम देते हो उपहार!
कहते हैं आतंक का कोई धर्म नहीं होता,
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर करना
तो फिर क्यूँ सारे आतंकी होते हैं,
अब तक जितने आतंकी निकले
सबका क्यों एक धर्म मज़हब जान।
मौत की नींद सो रही इस अबोध को देखो,
तुम्हारा दिल नहीं कचोटता होगा
जब हैं सारे तुम्हारी ही संतान ?

और कुछ सवाल,
कथित मानवाधिकारी
बुद्धिजीवी और फिल्मी कलाकार से,
क्या सूख गया तुम्हारी आँखों का सारा पानी ?
आतंकियों की पैरवी करने तुम सारे
पहुंच जाते हो आधी रात को कोर्ट,
आतंकियों की मौत पर करते हो सेना पर चोट!
उनके लिए हमेशा रहते रुदन पसार,
डर लगने लगता है तुम्हें हिंदुस्तान में!
नासिर,शाहरुख़ या आमिर
क्या आज मर गया तेरा ज़मीर …?
आज गुस्सा नहीं आया तुम्हें नासिर ?
इस मासूम चेहरे को देख दर्द नहीं हुआ हामिद ?
जब होती है आतंक पे कार्रवाई तो,
दिखने लगती है यहाँ असहिष्णुता
और करने लगते हो वापस अवार्ड!
आज इस दृश्य पे वो सारे क्यूँ है खामोश,
क्या आज नहीं है उन्हें कोई होश ?
न्यूजीलैंड में एक पीड़ित सिरफिरे ने
जब लिया आतंकवाद का बदला!
तो सब छाती पीटने लगे।

और आख़िर में…
बात-बात पर,
अपनी स्क्रीन ब्लैक करने वाले पत्रकार
आज क्यूँ है तुम्हारी स्क्रीन सफ़ेद ?
अरे! शर्म करो सब,
ये आतंकवाद है,ये किसी के हमदर्द नहीं
क्या भारत,क्या अमरीका,क्या सीरिया क्या श्रीलंका ?
सबको ले चुका अपनी चपेट में,
कल हिन्दू,आज क्रिश्चियन,कल सिक्ख और फिर मुस्लिम!
न तो अमन पसन्द है और न चमन पसन्द है,
ये किसी के नहीं हैं इन्हें बस खून पसन्द है
लाशों का ढेर पसन्द है।
कर देगा इस जहाँ को बर्बाद,
क्यूंकि ये है आतंकवाद।

और क्या कहूँ ?
क्या करूँ मैं सवाल!
कौन दे सकता है भला,
इन प्रश्नों का सटीक जवाब ?
है आपके पास ?
नहीं तो फिर मानवता के लिए ही सही,
इस मासूम में अपने प्रिय का अक्स देखकर
श्रद्धा के दो बूंद आँसू जरूर दें।
और भर लें एक आग हृदय में,
संकल्प लें आतंकवाद के खात्मे का…
यही इसकी श्रद्धांजलि होगी॥

परिचय- पंकज भूषण पाठक का साहित्यिक उपनाम ‘प्रियम’ है। इनकी जन्म तारीख १ मार्च १९७९ तथा जन्म स्थान-रांची है। वर्तमान में देवघर (झारखंड) में और स्थाई पता झारखंड स्थित बसखारो,गिरिडीह है। हिंदी,अंग्रेजी और खोरठा भाषा का ज्ञान रखते हैं। शिक्षा-स्नातकोत्तर(पत्रकारिता एवं जनसंचार)है। इनका कार्यक्षेत्र-पत्रकारिता और संचार सलाहकार (झारखंड सरकार) का है। सामाजिक गतिविधि के अन्तर्गत विभिन्न सामाजिक संस्थाओं से प्रत्यक्ष रूप से जुड़कर शिक्षा,स्वच्छता और स्वास्थ्य पर कार्य कर रहे हैं। लगभग सभी विधाओं में(गीत,गज़ल,कविता, कहानी, उपन्यास,नाटक लेख,लघुकथा, संस्मरण इत्यादि) लिखते हैं। प्रकाशन के अंतर्गत-प्रेमांजली(काव्य संग्रह), अंतर्नाद(काव्य संग्रह),लफ़्ज़ समंदर (काव्य व ग़ज़ल संग्रह)और मेरी रचना  (साझा संग्रह) आ चुके हैं। देशभर के सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हुई हैं। आपको साहित्य सेवी सम्मान(२००३)एवं हिन्दी गौरव सम्मान (२०१८)सम्मान मिला है। ब्लॉग पर भी लेखन में सक्रिय श्री पाठक की विशेष उपलब्धि-झारखंड में हिंदी साहित्य के उत्थान हेतु लगातार कार्य करना है। लेखनी का उद्देश्य-समाज को नई राह प्रदान करना है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-पिता भागवत पाठक हैं। विशेषज्ञता- सरल भाषा में किसी भी विषय पर तत्काल कविता सर्जन की है।